International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 2, Issue 3 (2016)

रावी लिखता है ‘‘एक समाज‘‘- मनोवैज्ञानिक अध्ययन

Author(s): रवीन्द्र कुमार, डाॅ0 विनोद कुमार
Abstract: मनुष्य का अकेला रहना असंभव है। समाज मानवीय जीवन का महत्त्वपूर्ण एवं लाज़मी भाग है। इसकी वजह से ही वह अपने जीवन एवं सभ्यता का विकास करता है। बदलते समयानुसार इसमें भी बदलाव वांछनीय है, जिसके अनुसार मनुष्य के विचारों तथा व्यवहार में भी बदलाव होना लाज़मी है। सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप व्यक्ति समाज में रहते हुए विभिन्न प्रकार के सामाजिक रोल अदा करता है ताकि वह समाज में अपना अस्तित्व बरकरार रख सके तथा अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा कर सके। अपने अस्तित्व के साथ-साथ यह भावी पीढ़ी के समृद्ध एवं विकासात्मक जीवन हेतु भी अत्यावष्यक है। विकास के नाम पर अपनी ही संस्कृति को कुचलना कदापि मानवीय हित में नही। पदार्थवादी सोच मे लिप्त मौजूदा पीढ़ी को इस बारे में सोचना अत्यावष्यक है।
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