International Journal of Hindi Research

International Journal of Hindi Research

ISSN: 2455-2232

Vol. 2, Issue 5 (2016)

जातीय अस्मिता और इतिहास बोध

Author(s): डाॅ0 नेहा कल्याणी
Abstract:
मनुष्य को अपने व्यक्तित्व का बोध स्मृति के सहारे होता है। यदि वह मानव जीवन की मुख्य घटनाएँ भूल जाये, अपने महत्वपूर्ण अनुभव भूल जाएँ, परिवार व समाज के लोगों से अपना संबंध भूल जाए, तो उसका व्यक्तित्व नष्ट हो जायेगा। यही स्थिति जाति और राष्ट्र की है। अस्मिता बोध की पहली शर्त है-इतिहास बोध। हिन्दी भाषी जनता अपना इतिहास पहचाने बिना न स्वयं को पहचान सकती है, न राष्ट्र को। इस इतिहास में बहुत से उतार चढ़ाव है, बहुत सी सांस्कृतिक समृद्वि गर्व करने की वस्तु है, बहुत से रुझान सामाजिक विघटन की ओर ले जाने वाले है।
डाॅ0 राम विलास शर्मा हिन्दी जातीय गौरव के प्रतिष्ठाता थे। उन्होंने भारतीय इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी समस्या के रुप में जाति व्यवस्था पर समग्रता से विचार किया है। जाति व्यवस्था को वह पराधीनता, बाहरी आक्रमण, विषमता व पिछडेपन का प्रधान कारण मानते है। कुछ विद्वान राष्ट्र या जाति को कल्पना मात्र मानते है, पर यदि राष्ट्रया जाति नाम की कोई वस्तु (घटक) नही है तो मानी बात है कि अमेरीकी प्रभुत्व के विस्तार का मुकाबला करना किसी के लिए आवश्यक नही है। फिर तो भारत भी एक राष्ट्र नहीं है, विघटित हो जाने पर यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया होगी।
भारत बहुजातीय राष्ट्र है, इस बहुजातीय राष्ट्र में एक जाति हिन्दी भी है। इसके मजबूत हुए बिना बहुजातीय राष्ट्रीयता का विकल्प हिन्दू राष्ट्र है। प्रत्येक जाति का सांस्कृतिक इतिहास होता है। हिन्दी जाति के सांस्कृतिक इतिहास में मुसलमानों का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। यदि हिन्दी राष्ट्र में जातीय चेतना सुदृढ होती, हिन्दी व उर्दू की बुनियादी एकता पर जोर दिया गया होता तो भारत का विभाजन ना होता, हिन्दी उर्दू का विवादित मसला ना होता। हिन्दी जातीयता राष्ट्रीयता की विरोधी नहीं, अपितु उसे पुष्ट करनेवाली है।
भारत में जातिप्रथा के खात्में के लिए जरुरी है वर्गसंघर्ष की चेतना के विकास पर जोर दिया जाए। सरकार ने आरक्षण का पैबंद लगाकर जातिप्रथा को कायम रखा। जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए जरुरी है भूमि सुधार लागू किए जाये। शिक्षा के बगैर किसी भेदभाव में गाँवों में समान रुप से विकास हो शिक्षा के पाठ्यक्रमों को इस तरह बनाया जाय जिससे छात्रों में वर्गसंघर्ष की चेतना का विकास हो। अस्पृश्यता व भेदभाव को जीवन के विभिन्न स्तरों पर सचेत रुप से खत्म करने के लिए अभियान चलाया जाए।

Pages: 04-06  |  1586 Views  509 Downloads
International Journal of Hindi Research
Journals List Click Here Research Journals Research Journals