International Journal of Hindi Research

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Vol. 2, Issue 5 (2016)

नागार्जुन के काव्य में धार्मिक भयादोहन की तीव्रभत्र्सना


डाॅ0 दीपा त्यागी

प्रगतिवादी कवि नागार्जुन का युग धार्मिक -विश्वासों के खण्डन का युग था। प्राचीन जर्जर रूढियों, अंध-विश्वासों एवं पुरातन मान्यताओं का सर्वत्र विरोध हुआ। धर्म के क्षेत्र में व्याप्त असमानता, साम्प्रदायिकता एवं धोखाधड़ी देखकर नागार्जुन विक्षुब्ध हो उठे तथा उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से धार्मिक भयादोहन की तीव्र भत्र्सना की । जाति से ब्राहाण होने पर भी धर्म की आड़ में ठगने वाले ब्राहमणों के प्रति रोष व्यक्त किया। कवि की दृष्टि में भगवान कल्पना पुत्र है यदि भगवान सच्ची पुकार सुनने वाला है तो दीन-हीन जनों का आर्तनाद उस तक क्यों नही पहुँचता ? धर्म के प्रतीक मंदिर, मस्जिद, मठ, तीर्थ आदि सभी स्थानों पर दुराचार है। धर्म के ठेकेदार पण्डित, पुरोहित, पीर, बाबा आदि धर्म के नाम पर अनेक प्रकार की भ्रष्टताओं को जन्म देते हैं। नागार्जुन जब तक जीवित रहे एक नये कश्मीर की कल्पना करते रहे। उनका कहना था-"मात खाएगें हिन्दी पंडित पाकिस्तानी पीर लो देखो वह खड़ा हो रहा नया-नया काश्मीर।" उनकी कविता धार्मिक क्षेत्र में शांति, समता एवं एकता का उद्घोष करती है। वर्तमान समाज के लिए भी वह उपादेय है।
Pages : 28-30