International Journal of Hindi Research

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Vol. 2, Issue 5 (2016)

उषा प्रियवंदा के उपन्यास ( शेषयात्रा, अंतवर्शी, रुकेगी नही राधिका ) प्रवासी जीवन व संघर्ष के सन्दर्भ में


पूनम आर्या

आज औद्योगीकरण से बढ़ती हुई जटिलता नगरीकरण के बढ़ते दायरों के साथ - साथ व्यापक मानववादी भावना का फैलना प्रारम्भ हो गया है। आज के वैज्ञानिक युग में जब यातायात के साधानों और सुगमता में यूरोप क्या अमेरिका और एशिया सारा विश्व सिमटकर एक दूसरे की सीमाओं समस्याओं से प्रभावित हो रहा है। अतः वैश्वीकरण के इस दौर में बेहतर अवसरों की तलाश में युवा वर्ग का विदेशों की ओर आकर्षित होना और वहा बसकर अपने भविष्य को संवारते हुए प्रवासी जीवन बिताना स्वाभाविक ही लगता है किन्तु आज समस्त विश्व में स्थितियाॅ, समस्याऐं लगभग एक जैसी ही है। क्योंकि प्रभाव तो सर्वत्र एक जैसा ही पड़ता है। वैज्ञानिक प्रगति के बढ़ते चरणों ने व्यक्ति को अधिकाधिक तार्किक और बौद्धिक बना दिया और उसी के कारण समस्त पुराने संस्कारो पर प्रश्न चिन्ह लगने शुरू हो गया है सर्वत्र एक मोहभंग और आस्थाहीन जैसी स्थितियाॅ मौजूद नजर आने लगी। इन्ही सब कारणों के चलते प्रवासी जीवन संघर्ष और मोहभंग की दास्तान बन गया। उषा प्रियंवदा ने अपने उपन्यासों में अत्यन्त बारीकी से उन तमाम भारतीय परिवारों की जीवन शैली का विश्लेषण किया है। जो बेहतर अवसरों की तलाश और आशा में प्रवासी हो जाते है। और फिर शुरू होता है। उनके प्रवासी जीवन का संघर्ष।
Pages : 52-54