International Journal of Hindi Research

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Vol. 3, Issue 1 (2017)

भारत के बौद्ध तीर्थं स्थलों में सारनाथ का महत्त्व


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सारनाथ में भगवान् बुद्ध ने प्रथम उपदेश देकर जो धर्मचक्र प्रवर्तन किया था। वह कल्याणकारी एवं मंगलकारी धम्म का प्रारंभ किया था। जो मानव के लिए सबसे पहला सामाजिक क्रांति था। सारनाथ का प्राचीन नाम मृगदाव था। जहाँ के हरे-भरे जंगलों में मृगों का झुण्ड रहा करता था। धर्मचक्रप्रवर्तन के पश्चात बुद्ध ने भिक्षुसंघ की नींव रखी थी तथा अपने 60 भिक्षुओं के साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष में समता एवं समानता की अलख जगा दी। सम्राट अशोक ने बुद्ध से संबंधित घटना स्थलों को चीर स्थायी प्रदान करने के लिए भव्य स्मारकों का निर्माण करवाया तथा बौद्ध धर्म को अपना राजाश्रय एवं संरक्षण प्रदान किया। श्वेन-त्सांग अपने विवरण में लिखा है कि मूलगंधकुटी बिहार के शीर्ष मार्ग पर सोने का आमतल सुशोभित था। बिहार की सीढ़ियां पत्थर की बनी हुई थी।
1794 ई.वी. में बनारस के जमींदार बाबू जगत्सिंह के आदमियों द्वारा जगत्सिंह मोहल्ला बसाने हेतु सारनाथ के प्राचीन अवशेषों को तहस-नहस करना एवं ईटें उखाड़ कर ले जाना बौद्ध धर्मावलम्बियों एवं देशवासियों पर कुठाराघात किया। सर्वप्रथम सारनाथ का कनिंघम ने दिसम्बर 1834 से लेकर जनवरी 1936 ई.वी. तक सरवेक्षण करके रिपोर्ट प्रस्तुत किया। सारनाथ में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित 3 स्तूपों के अवशेष अभी मिलें है। जैसे - 1. धमेख स्तूप, 2. धर्मराजिका स्तूप, 3. चैखडी स्तूप। ऐसे कई अन्य स्तूप होंगे। आवश्यकता है और खुदाई की।

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