International Journal of Hindi Research

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Vol. 3, Issue 1 (2017)

शॅापिंग मॉल संस्कृति: मध्ययुगीन मानसिकता की महक और स्त्री


प्रियंका कुमारी सिंह

आज के इस उपभोक्तावादी दौर में हर व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा चीजों को संचय करने की जद्दोजहद में किसी भी हद को पार करने को तैयार है। क्योंकि मार्केट में उसे अप टू डेट रहना है। उसे पावर-पोजीशन-पैसा चाहिए। फेम चाहिए। लेकिन इन सपनों की क्या कीमत है इससे आज का हमारा युवा वर्ग अनजान है या यों कहें की वो अपनी सपनीली दुनिया से बाहर आना ही नहीं चाहता। वो तो बस बाजार की चकाचैंध में बह जाना चाहता है। स्त्री भी इस बहाव को महसूस कर रही है और बाजार का हिस्सा बन अपनी उपस्थिति उसने दर्ज कर दी है। आवश्यकता बस इस बात है कि वो संतुलन बनाए रखते हुए आगे बढ़े। उड़ान भरने की चाहत में व्यवस्था की कठपुतली बनकर न रह जाए। क्योंकि व्यवस्था और बाजार ने नये शोषण तंत्र की सृष्टि की है। स्त्री को आज उपनिवेश बनाने की साजिशें हो रही हैं। अतः स्त्री को बाजार की विसंगतियों को समझना होगा। सांस्कृतिक अवमूल्यन के इस दौर में उसे अपनी इयत्ता को बरकरार रखना होगा।
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