International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 1 (2017)

योगवासिष्ठ में अन्तःकरण विमर्श

Author(s): पीयूष अग्रवाल
Abstract: प्रस्तुत शोधपत्र में अन्तःकरण का स्वरूप स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है क्योंकि व्यवहार के अन्तर्गत अन्तःकरण (मन+ बुद्धि+ चित्त+ अहङ्कार+ हृदय आदि) की प्रवृत्तियाँ ही प्रमुख होती हैं इसलिये अन्तःकरण के विभिन्न आयामों को जानना और समझना अपेक्षित है। मनोविज्ञान साईकोलोजी का सही अनुवाद है? क्योंकि पश्चिम में “साईकी” शब्द का अपना एक इतिहास है जो एक सांस्कृतिक-वैज्ञानिक-दार्शनिक मूल्य के रूप में प्रयोग होता है। जबकि भारत में मन “अन्तःकरण” का एक भाग है और इस अन्तःकरण में मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार सम्मिलित हैं। अतः अन्तःकरण शब्द तो सम्भवतः साईकोलोजी का समीपवर्ती अनुवाद हो सकता है परन्तु फ़िर भी भारतीय मनोविज्ञान को परिभाषित करने में कई व्यावहारिक कठिनाईयाँ दृष्टिगत होती हैं परन्तु अन्तःकरण के अन्तर्गत मनोविज्ञान को इस प्रकार परिभाषित किया जाए कि वह अध्यात्म के क्षेत्र का अतिक्रमण न करे और वह दैनन्दिन समस्याओं का विश्लेषण करे भी और करना सिखाए भी। वेद, उपनिषद्, सहित्य और दर्शन में अनेक गुणात्मक और विश्लेषण पूर्ण तथ्य मन के विषय में कहे गए हैं जिनकी चर्चा अन्तःकरण स्वरूप पक्ष से अपेक्षित है।
Pages: 58-60  |  1644 Views  539 Downloads
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