International Journal of Hindi Research

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Vol. 3, Issue 1 (2017)

स्मृतिग्रंथों में वर्णित अर्थ और राजनीति की अवधारणा


सोनू

अर्थतन्त्र ही शासनतन्त्र के संचालन का आधार है, जिसके बिना राज्य एवम् राजनीति निष्क्रिय व निष्प्राण हो जाता है। महाभारत में भी वर्णित है कि अर्थ-शून्य राजा बलविहीन होता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर प्राचीन भारतीय विचारकों ने राज्य की समृद्धि हेतु आर्थिक सम्पन्नता पर विशेष बल दिया, जिसके सम्बन्ध में वर्णित विचारों से राज्य एवम् राजनीति का आर्थिक पहलू प्रस्फुटित होता है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में राजस्व-व्यवस्था, राजकर-प्रणाली, राजकीय सहायता, शुल्क, अनुदान, ऋण वितरण आदि विषयों पर अनेक प्रकार के विचार मुखरित हुये हैं। इन उपक्रमों की पूर्ति हेतु कोष-संचय का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह अर्थ-संग्रह कभी भी राजा की व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नहीं था। इसका उद्देश्य जन-कल्याण था। जन-कल्याण एवं राजशक्ति के संरक्षण की अनिवार्यता (आपातकाल) में जन-इच्छा के विपरीत भी अर्थ का संग्रह किया जा सकता था।
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