International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 2 (2017)

बुध्दम् शरणम् गच्छामि__धम्मम् शरणम् गच्छामि__संघम् शरणम् गच्छामि !!

Author(s): प्रो. राजकुमार लहरे
Abstract:
बुध्दत्व का अर्थ होता है- जागना, बोध होना। जागने से तात्पर्य है- सचेत होना; अर्थात मैं कौन हूूॅ, कैसा हॅू, संसार क्या है? आदि प्रष्नों को समझना। बुध्दि, बोध, बुध्दत्व (प्रज्ञा); ये तीन अवस्था है आत्म-ज्ञान होने का। इसी अवस्था को पाने के लिए जागना पड़ता है। अर्थात जिसका चेतना जाग्रत अवस्था में है, और जो बोध की पराकाष्ठा प्रज्ञा तक पहुॅचा हो, बुध्द Simble of knowledge का प्रतिरुप है और यह संसार में, ऐसा पहली बार घटित हुआ- गौतम बुध्द के रुप में! और इसे Light of Asia कहा गया। तथा बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को नव बुध्द।
संसार दुःख के हेतु, जन्म-मृत्यु दो छोर, जिंदगी संघर्षमय, इन्हीं के बीच उत्थान-पतन का अनवरत क्रम है। किसी की अति और अत्यल्प ठीक नहीं, अपितु दोनों के मध्यम आष्टांगिक मार्ग का उपदेष बुध्द ने दिया और बुध्द के मार्ग को लोगों ने सहज स्वीकार कर स्वेच्छा से धारण किया, यही सच्चा धर्म है। बुध्दत्व ज्ञान की चरमोत्कर्ष है और ज्ञान वह साधन है जिससे व्यक्ति देवत्व पद को प्राप्त कर सकता है। जहाॅ हृदय में प्राणिमात्र के प्रति, किसी भी प्रकार से भेदभाव, छुआछूत, उॅंच-नीच, हेयदृष्टि न हो तथा मन में सत्य, समता, अहिंसा, सदाचार, पंचशील, त्याग, अपनापन हो। जिसे सबसे पहले सिध्दार्थ ने पाया और गौतम बुध्द हो गया।

Pages: 34-36  |  1355 Views  400 Downloads
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