International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 2 (2017)

पं. लखमीचंद के सांगों में लोक-जीवन

Author(s): डाॅ. पूनम काजल
Abstract: कबीर की ही भाँति ‘मसि कागद छुओ नहिं कलम गह्यो नहिं हाथ’ को सार्थक करने वाले हरियाणवी साहित्यकार एवं रागनी के वर्तमान स्वरूप के जन्मदाता पं. लखमीचंद जी ने हरियाणवी सांग विधा को परम्परागत रूढ़िगत बन्धनों से मुक्त कर एक नई दिशा दी। इनके सांगों में लोकमानस की भावनाएँ, करूणा और व्यथा पूर्ण व्यापकता के साथ दिखाई देती हैं। उनका व्यापक रचना-संसार इतिहास, पुराण एवं लोक से कथात्मक आधार ग्रहण करके भी हरियाणवी जन-जीवन से गहरे से जुड़ा हुआ है।
Pages: 30-33  |  1596 Views  894 Downloads
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