International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 2 (2017)

बोधिसत्व बाबा साहेब डाँ. भीमराव अम्बेडकर: एक प्रकाश-स्तंभ

Author(s): प्रो0 राजकुमार लहरे
Abstract:
भारतीय इतिहास का दैदिप्यमान नक्षत्र, ज्ञान के पर्याय, मानवता के समर्थक, समतावादी, सत्य के सजग प्रहरी, समाज में पिछड़ों, दलित, शोषित तथा मजदूरों के सच्चा हितैषी, भारत का संविधान निर्माता, कोमल हृदय सम्राट तथा बहुमुखी प्रतिभा केे धनी, समाजसेवक, बाबा गुरुघासीदास जी के विचार मानव-मानव एक समान एवं सादा जीवन उच्च विचाार को अपना आदर्श बनाने वाला, भारत-रत्न बाबा साहब डाॅ भीमराव अम्बेडकर जी का विचार आज के समसामयिक संदर्भ में अक्षरशः प्रासंगिक है। तथाकथित ज्ञानी समुदाय, उच्चवर्ग द्वारा समाज को ज्ञान-दासता के भॅंवरजाल में उलझाकर रखनेवालों को सद्मार्ग सुझाकर अपना प्रतिभा का लोहा मनवाया।
विकास के पुरोधा डाॅ अम्बेडकर ने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, साॅंस्कृतिक आदि समता के लिए हमेशा समाज में गरीब, मजदूर, पिछड़े, आदिवासी तथा निम्न स्तरीय जीवनयापन करने वालों के प्रति भारत का संविधान निर्माण करते समय ध्यान रख आरक्षित किया। जिससे व्यक्ति को समान व सर्वांगीण विकास के लिए अवसर मिल सके तथा अहिंसा, सेवा, त्याग, समर्पण का संदेश देते हुए कहा कि शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। इसके लिए जागना होगा, जिससे सदियों के गुलामगिरी से मुिक्त मिल सके। वर्ग, रंग, वंश, सम्प्रदाय, धर्मगत- जाति-पाति, छुआछूत, उॅंच-नीच, भेदभाव को इसमें बाधक मानते हुए शिक्षा ज्ञान को विकास के लिए सार्थक व अनिवार्य आधार बताया। जिससे सबका विकास, सबके साथ हो सके। संभवतः इसीलिए जीवन के अंतिम पड़ाव में जरुरतमंदों को सही दिशा-निर्देश के लिए बुध्द हो, आकाशदीप की भाॅंति प्रकाश-स्तंभ बन आलोकित करता रहा है।

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