International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 3 (2017)

हिन्दी गज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार

Author(s): सोनिया राठी
Abstract: दुष्यंत कुमार ने उर्दू के सटीक से सटीक शब्दों का उपयोग कर के हिन्दी गज़ल को मजबूती प्रदान की। उर्दू शेरों में फारसी व अरबी शब्दों के साथ कई हिन्दी शब्द भी हैं, वहीं हिन्दी गज़लों में उर्दू, फारसी, अरबी शब्दों के साथ संस्कृत व हिन्दी के शब्द स्वतंत्रतापूर्वक इस्तेमाल हुए हैं। भाषाएँ सीमा बना कर तलवारों या बंदूकों से अपने-अपने शब्दों की रक्षा नहीं करती, वरन मित्रता पूर्वक आदान-प्रदान करती हैं। उनके द्वारा जलाई गई हिन्दी गज़ल की मशाल कई अन्य शायरों ने हाथ में ले कर गज़ल यात्रा को आगे बढ़ाया। जहाँ उर्दू की शायरी तीन चार शताब्दियों तक इश्क से बाहर नहीं आ पाई, वह केवल साकी, बज्म, तगाफुल, मकतबे-इश्क, शराब, सागर, बुलबुल, सैयाद, कफस आदि में कैद रही, गमे-जानाँ वाली शायरी ही अधिक पली-पनपी, वहीं दुष्यंत ने शायर को सीधे व्यवस्था से टकराना सिखाया। अनेक युवा शायर तक दुष्यंत कुमार की विरासत सीने से लगा कर गज़ल को नित नए आकाशों और जमीनों तक ले जा रहे हैं। एक शायर के रूप में दुष्यन्त कुमार अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे। समाज को जागृति प्रदान करने के लिए भी उनकी लेखनी सदैव ज्वलनशील रही। उन्होंने भले ही निराशा एवं क्रोध का अधिकाधिक चित्रण किया लेकिन अंततः उनका स्वर आशावादी ही रहा। हिन्दी कविताओं में कबीर के बाद इतना अक्खड़पन केवल दुष्यन्त कुमार की ही रचनाओं में उभरकर सामने आया। यथार्थवादी गज़लों के साथ ही दुष्यंत कुमार का युग आरंभ होता है।
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