International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 4 (2017)

कामतानाथ की कहानियों में मानवाधिकार की चेंतना

Author(s): अनुश्री त्रिपाठी, डाॅ0 प्रमिला बुधवार
Abstract:
कामतानाथ सत्तर के दशक में उभरने वाले उन महत्वपूर्ण कथाकारों में आते हैं जो प्रेमचंद की सामाजिक और यथार्थवादी दृष्टि को अपनाते हैं। इस संदर्भ में राजकुमार की यह टिप्पणी यहाँ उल्लेखनीय है- ’’वे मूलतः प्रेमचंद की परम्परा के कथाकार हैं। प्रेमचंद की परम्परा का कथाकार कहने से आशय प्रेमचंद की यथावत् पुनर्प्रस्तुति से नहीं हैं। उन्होंने प्रेमचंद की परम्परा का अपने ढंग से विस्तार और नवोन्मेश किया है। उनकी कहानियां सामाजिक सरोकार की कहानियां हैं। सामाजिक सरोकार की चिंता उनकी कहानियों के कथ्य को ही नहीं, भाषा और शिल्प को भी काफी दूर तक निर्धारित एवं नियंत्रित करती है।...... यथार्थवादी शिल्प की महत्ता और सार्थकता को वे स्वयं स्वीकार करतें हैं।
प्रेमचंद की परम्परा से अर्थ समाज की जमीनी सच्चाई को न सिर्फ कागज पर उतारना बल्कि स्वयं भी सामाजिक संघर्ष में हस्तक्षेप करना हैं। कामतानाथ निम्नमध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से जुड़े एक ऐसे कथाकार हैं जो स्वयं जीवन के हर स्तर पर संघर्ष करते हैं। कामतानाथ जहाँ वामपंथी विचारधारा को आधार बनाकर ट्रेड यूनियन में सक्रिय भागीदारी करते हैं वहीं साहित्य जगत में समांतर कथा आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कामतानाथ स्वयं कहतें हैं-’’ साठ के दशक के प्रारंभ से लेकर आज तक मैं कहानी के इस सफर का चश्मदीद गवाह हूँ। ’समांतर’ और प्रगतिशील लेखक’ आंदोलनों में मेरी सक्रिय भागीदारी भी रही।
Pages: 55-56  |  870 Views  380 Downloads
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