International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 4 (2017)

प्रेमचंद एवं मार्टिन विक्रमसिंह की कहानियों में चित्रित दलित समाज का तुलनात्मक अध्यमयन

Author(s): डाॅ0 आर0 के0 डी0 निलंति कुमारी राजपक्ष
Abstract:
प्रेमचन्द (सन्. 1880 से सन्. 1936 तक) और मार्टिन विक्रमसिंह (सन्. 1890 से सन्. 1976 तक है) अलग-अलग देशों के निवासी होने पर भी समकालीन होने के नाते उनकी कहानियों की विषयवस्तु पर तत्कालीन समस्याओं का प्रभाव पड़ा है।
प्रेमचन्द का कहानी साहित्य विभिन्न श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। इनमें से एक श्रेणी दलित समाज से संबंधित कहानियाँ हैं। दलित जीवन से जुड़ी प्रेमचन्द की कहानियाँ कई तरह की हैं। कुछ कहानियों में दलितों की समस्याएँ सीधे-सीधे उठाई गई हैं। ऐसी कहानियों में दलित पात्र कहानी का मुख्य चरित्र है। उनकी रचनाओं में दलित पात्र व जीवन किसी न किसी रूप में शुरू से आखिर तक आया है। प्रेमचंद की दलित समाज से संबंधित कहानियों में ‘मंदिर’, ‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुँआ’, ‘दूध का दाम’, ‘कफन’, ‘घासवाली’, ‘जुरमाना’, ‘राष्ट्र का सेवक’, ‘शूद्रा’, ‘सिर्फ एक आवाज़’, ‘मंत्र’, ‘कज़ाकी’, ‘गुल्ली डंड़ा’ आदि प्रमुख हैं।

मार्टिन विक्रमसिंह की कहानियों में चित्रित दलित समाज
मार्टिन विक्रमसिंह की अनेक कहानियों में दलित समाज के कष्ठों का चित्रण हुआ है।
‘विनोदास्वादय’ इस प्रकार की कहानी है। इसमें अमीर परिवार के लोगों के विनोद के लिए गरीब बच्चे प्रयोग किए जाते हैं।
कुछ अमीर व्यक्ति गरीब परिवारों की लड़कियों को अपने जाल में फंसा कर उनके साथ सुखपूर्ण जीवन बिताने के बाद उन्हें छोड़ देते हैं। इस प्रकार की घटना ‘कुवेणिहामि’ कहानी में विद्यमान है। यह केवल कुवेणिहामि की ही कथा नहीं है, बल्कि नौकरानी बनकर दूसरों के घर जाने वाली बहुत सी गरीब लड़कियों की कहानी है।
‘गॅहॅणियक’ कहानी में नोनाहामि बहुत दुःख झेलती है। उसका पति उसे छोड़कर चला गया है। अनपढ़ होने के कारण नोनाहामि को किसी कार्यालय में नौकरी नहीं मिल सकती। अनपढ़ गाँव वाले सोचते हैं कि भगवान सब कुछ करते हैं। हमारे भाग्य के अनुसार ही सब कुछ होता है। कर्म के आधार पर ही सुख और दुःख मिलते हैं।
‘सल्लि’ कहानी में शहर में जीने वाले गरीब लोगों का जीवन दिखाया गया है। इस कहानी का नायक बहुत गरीब है। उसका घर बहुत छोटा है। उन लोगों का बच्चा बीमार है। बच्चा बिना दूध के भूखा रह जाता है। वह पीकर घर पहुँचता है। इस प्रकार आदमियों के शराब पीने के वजह से घर परिवार के लोग ही नहीं समाज में रहने वाले अन्य लोग भी परेशान होते हैं।
इस प्रकार मार्टिन विक्रमसिंह ने अपनी कहानियों में शहरी जीवन से संबंधित दलितों की अनेक समस्याएँ दर्शाई हैं।
माँ बाप न होने के कारण बच्चों को अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं। वे अनाथ बच्चे अपने जीवन-यापन के लिए दूसरों के घर नौकर बनकर जाते हैं। उन घरों में अनेक दुःख और पीड़ा झेलते हैं। मार-पीट और डाँट खाते हैं। पर उन बच्चों के लिए दूसरा रास्ता भी नहीं है। ‘बुदुरॅस’ कहानी में मल्लिसा भी इस प्रकार का अनाथ बच्चा है। उनके माँ-बाप न होने के कारण दिनेष वैद्य के घर में नौकर बनकर जाता है। उस घर में बहुत सारा काम भी करना पड़ता है और मार और डाँट भी हर दिन खानी पड़ती है।
‘हिगँन्ना’ कहानी में मुख्य भिखारी भिक्षा मांगने के लिए एक अनाथ बच्चे का प्रयोग करता है। इस प्रकार के बच्चे ही आगे चलकर गुंडे, डाकू आदि बनेंगे क्योंकि इन बच्चों को बचपन से ही झूठा काम सिखा दिया गया है। यह समाज के लिए एक भयानक स्थिति है। इस प्रकार समाज चलेगा तो पूरा देश नाश होगा। इस यथार्थ पर मार्टिन विक्रमसिंह ने ध्यान दिया।
निष्कर्षतः प्रेमचंद एवं मार्टिन विक्रमसिंह की कहानियों में दलितों का मार्मिक चित्रण हुआ है। मार्टिन विक्रमसिंह की अपेक्षा प्रेमचंद की कहानियाँ सुधारवादी भावना से भरपूर है।

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