International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 3, Issue 4 (2017)

नरेन्द्र कोहली के रामकथात्मक उपन्यास: एक विवेचनात्मक अध्ययन

Author(s): रेखा रानी
Abstract: भारतीय पुराकथाएं अपनी काजलयी चेतना के कारण सहस्त्रों वर्षों से भारतीय साहित्य की समस्त विधाओं में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहीं हैं। भारतीय आधुनिक हिन्दी उपन्यास साहित्य भी पौराणिक रचनाओं के मोह से खुद को मुक्त रखने में अक्षम रहा है। ‘राम‘ और ‘कृष्ण‘ के पुराकथाओं को नवीन कलेवर देकर एवं अद्यतन प्रासंगिकता के साथ प्रस्तुत करके, हिन्दी उपन्यास साहित्य को नवीन आयाम प्रदान करने वाले ‘डा0 नरेन्द्र कोहली जी‘ ने इन पौराणिक आख्यानों पर आधृत रचनाओं को मिथकीय रचनाओं की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया है। राम की पौराणिक कथा पर आधृत उनकी ‘दीक्षा’, ‘अवसर’, ‘संघर्ष की ओर’ एवं ‘युद्ध’ उपन्यास; ‘अभ्युदय’ के दो भागों में संकलित हंै तथा किसी भी भाषा में 1800 पृष्ठों मे लिखी गई प्रथम, एक वृहद् उपन्यास है जो पौराणिक होते हुए भी यथार्थ की पृष्ठभूमि पर रचित है। अन्य उपन्यासकारों से भिन्न दृष्टिकोण रखते हुए ‘कोहली जी‘ ने अपने रामकथात्मक उपन्यासों में रामकथा की महानता, कथा के पात्रों की मानवीय क्षमता, तद्युगीन मानवीय दृष्टिकोण इत्यादि सभी को स्वीकार किया है। किन्तु, इसके साथ ही राम के पुरातन कथाओं में स्थित अलौकिकता एवं चमत्कारिता को मुक्त करवाते हुए, मूल रामकथा के पात्रों एवं संदर्भों को मानवीय धरातल पर देखने का प्रयास किया है। इतना ही नहीं इन चारों उपन्यासों में समकालीन स्थितियों को गहरी संवेदनशीलता और गहन चिंतन के साथ प्रस्तुत करते हुए; परम्परागत रामकथा को आधुनिक संचेतना के आलोक में तर्क-संगत पुनव्र्याख्या द्वारा नवीन अर्थ और सर्जनात्मक रूप देने का भी प्रयास किया गया है। ‘राम‘ का ‘विश्वामित्र‘ से धर्म का दीक्षा लेना, दीक्षित हो वन जाना, वन में राक्षसों से संघर्ष करना और फिर युद्ध कर जनता का अभ्युदय करने तक की संपूर्ण कथा को ‘अभ्युदय’ उपन्यास- श्रृंखला में न सिर्फ क्रमबद्ध तरीके से संजोया गया है अपितु, इस संपूर्ण कथा के माध्यम से आधुनिक पाठकों के समक्ष युगचेतना को प्रतिबिम्बित एवं विश्लेषित कर पाठकों को अपने युग-चेतना को देखने, पहचानने एवं युग सत्य से मिथकीय सत्य की तुलना करने का अवसर प्रदान किया गया है। एक ओर जहाँ विश्वामित्र के आश्रम में राक्षसों के उत्पात से लेकर राम-सीता का विवाह एवं परशुराम की पराजय तक की रामायणी कथा को संजोये ‘दीक्षा’ उपन्यास में राम के युग के राजनीतिक व्यवस्थाओं, जन सामान्य के शोषण, समाज में नारी का स्थान, जाति-वर्ण की विभीषिकाओं, स्त्री-पुरुष संबंध, स्वार्थी बुद्धिजीवियों एवं शासनाधिकारियों की मानसिकता आदि विषयों को समकालीन संदर्भों के साथ समन्वयात्मक रूप देने का प्रयास किया गया है। वहीं, ‘अवसर’ उपन्यास के माध्यम से आज के युग की मुख्य समस्याओं को उजागर किया गया है। ‘दंडकवन‘ से ‘पंचवटी‘ तक की कथा को संजोये ‘संघर्ष की ओर’ उपन्यास भी ‘राम‘ के पौराणिक कथाओं मे वर्णित घटनाओं का तर्कसंगत, बुद्धिवादी, समाजशास्त्रीय, राजनैतिक और ऐतिहासिक विश्लेषण; आधुनिक ढ़ग से करता है। इसी तरह ‘युद्ध’ उपन्यास ‘किष्किंधा कांड‘ से लेकर ‘लंका कांड‘ तक की कथा के अतिमानवीयता एवं अलौकिकता को पूर्ण रूप से तिरस्कृत कर, उन कथाओं को लौकिक, तर्कसंगत एवं मानवीय आधार पर व्याख्यायित करते हुए ; राम-रावण को समकालीन संदर्भ में पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति शोषितों के स्वातंत्र्य युद्ध के रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकार ‘कोहली जी‘ की रामकथात्मक उपन्यास पौराणिक होते हुए भी; चिर नवीन है। इसकी कथावस्तु आधुनिक पाठकों कोे पौराणिक से आधुनिक तक की यात्रा करवाती है।
Pages: 27-31  |  1481 Views  498 Downloads
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