International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 1 (2018)

कबीर व्यक्तित्व व दर्शन का समसामयिक प्रासांगिकता

Author(s): राज कुमार लहरे
Abstract: कबीर कबीर थे- अनुपमेय, विलक्षण, निडर, युगद्रष्टा, सत्य के अनन्य उपासक, ज्ञानमार्ग के पथिक, एक फक्कड़ मसीहा, सरल, सरस व उदारमना व्यक्तित्व के धनी यद्यपि कठोर निर्णायक, सामाजिक नेता व सुधारक, वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण चिंतक, प्रखर वक्ता तथा धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग, जाति, वंश, कुल, रंगभेद, उॅंचनीच आदि भेदभाव के धूर विरोधी, प्रेममयी संवेदनात्मक ज्ञान द्वारा सत्यानुभूति कर बुध्द वाक्य ’अप्प दीपो भवः’ से अनुप्राणित तथा सत्य ही ईश्वर है का प्रबल समर्थक, सामाजिक, साॅस्कृतिक, समता के विश्वासी, पारख दर्शन के प्रणेता, दलित, शोषित, कमजोर मजलूमों के सच्चा हितैषी, चाहे किसी कोण से देखो अपने आप में पूर्ण व्यक्तित्व! वास्तव में कबीर व्यक्ति नहीं, वरन् आज के लिए एक सोच है, चिंतन है, दर्शन है, राह और मंजिल भी!! समसामयिक परिवेश में यह ज्ञान अधिकाधिक प्रासंगिक होता जा रहा है; जिससे तत्कालिक समस्याओं का उचित समाधान हो सके। जिसे अनुयायीगण कबीर सिध्दांत का चैकाआरती, भजन, सत्संग, उपदेश आदि के माध्यम से लोक सेवाार्थ प्रचारित व प्रसारित करते रहे हैं। अतः 21 वीं सदी में स्वस्थ वैश्वीकरण के लिए इसकी प्रासंगिकता निर्विवाद प्रतिपादित हो जाता है।
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