International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 1 (2018)

अब्दुल बिस्मिल्लाह के कथा साहित्य में आत्मसंघर्ष का स्वरूप

Author(s): रविशंकर पाठक
Abstract:
प्रस्तुत शोध पत्र अब्दुल बिस्मिल्लाह के कथा साहित्य में आत्मसंघर्ष का स्वरूप पर आधारित है। भारत देश में अलग-अलग धर्म, अलग जाति निवास करती है। प्रत्येक धर्म समाज की संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। धर्म सामाजिक नियंत्रण की प्रमुख संस्था है तथा वह जनता के नैतिक स्तर को ऊँचा करता है। मनुष्य की असामाजिक वृत्तियों पर नियंत्रण रखकर मानव मर्यादा की स्थापना करता है। धर्म के नियमों को आचरण में ढालकर ही मनुष्य जीवन सफल होता है। डाॅ. राधाकृष्णन का मत है कि, ‘‘धर्म परम मूल्यों में विश्वास और उन मूल्यों को उपलब्ध करने के लिए जीवन की पद्धति का प्रतीक होता है।’’1 यह नैतिक व्यवस्था को जन्म देता है जिसके परिणाम स्वरूप नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का जन्म होता है। इसलिए यह मानवता को विकास की और गतिशील करता है। धर्म अंधविश्वास नहीं है, धर्म अलौकिकता में नहीं है, वह जीवन का अत्यंत स्वाभाविक तत्व है।
हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई तो सबने मिलकर लड़ी। लेकिन अंग्रेजों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए भारतीय मन को हिन्दू और मुसलमान मन को बाँटा। फलस्वरूप देश का विभाजन हुआ। भारत और पाकिस्तान दो राष्ट्रों का निर्माण हुआ। इसका परिणाम आज हम दंगे के रूप में देखते हैं। इस प्रकार साम्प्रदायिक समस्या का हल विभाजन गलत साबित हुआ। स्वतंत्रता के बाद सबसे अधिक काला धब्बा, उन साम्प्रदायिक दंगों को है। जो देश के कोने-कोने में भड़कते रहते हैं। एक तरफ पाकिस्तान का उदय तो दूसरी ओर हिन्दू साम्प्रदायिकता से तात्पर्य धार्मिक भावना से प्रेरित होकर उन व्यवहारों को कराने से है, जिन्हें दूसरे धर्म के लोग पसंद नहीं करते। हिन्दू प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ प्रारम्भ से लेकर आज तक संघर्ष करती आयी हैं। शहरों में यह काम बहुत आसान होता है। क्योंकि वहाँ एकता जैसी कोई बात नहीं है। लेकिन देहातों में जहाँ मुस्लिम मजारों पर हिन्दू घरों को बुलाया जाता है और जहाँ मोहर्रम के अवसर पर हिन्दू मनौतियाँ माँगते हैं। जिस गाँव का मुसलमान दशहरे में चंदा देता है। मंदिर के लिए जगह बक्षिस के रूप में दी जाती है वहाँ अलगाव फैलाना असंभव है।
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