International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 1 (2018)

स्वातन्त्रयोत्तर युगीन महिला उपन्यासकारों की रचनाओं में स्त्री विमर्ष

Author(s): डाॅ0 रेखा
Abstract:
सामान्यतः ’विमर्ष’ का अर्थ है - ’’जीवंत बहस’’। किसी भी समस्या को एक कोण से न देखकर भिन्न-भिन्न मानसिकताओं, दृष्टियों संस्कारों एवं वैचारिक-प्रतिबद्धताओं का समाहार करते हुए उलट-पलट कर देखना या उस समग्रता को देखने की कोशिश करना। इसके अलावा विमर्ष का अभिप्राय- विवेचना, समीक्षा, तथ्यानुसंधान, तर्क, ज्ञान एवं किसी तथ्य की जानकारी हेतु किसी से परामर्श या सलाह करने से भी हैं।
साहित्य ही एक ऐसा माध्यम हंै, जिसके माध्यम से किसी भी समस्या एवं उसके समाधान की बखूवी अभिव्यक्ति की जा सकती है, चूँकि साहित्य आन्दोलन को प्रभावित करता है और आन्दोलन साहित्यकार (लेखक) को। हर भाषा के साहित्य विमर्ष का अपना सामाजिक आधार होता है। अपनी समस्याऐं और अपना स्वरूप होता है। यह संभव है कि कुछ मुद्दों को लेकर उसका एक असीम स्वरूप निर्मित हो जाए, लेकिन यथार्थ में वह अपने समय एवं समाज के सापेक्ष ही होता है। इसलिए किसी भी विषय के किसी भी विमर्ष का मूल्यांकन करते समय उसके सामाजिक ढाँचे को भी ध्यान में रखना परमावष्यक है।
Pages: 51-53  |  1012 Views  517 Downloads
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