International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 2 (2018)

स्वातंत्रयोत्तर कविता के मानव मूल्यों में सौन्दर्य बोध

Author(s): Mamta Vinod Tripathi
Abstract:
स्वातंत्रयोत्तर कविता में मानवता के परिप्रेक्ष्य में मूल्य-सौन्दर्य की दृष्टि को विकसित करने के लिए कवियों ने नवीन संदर्भों एवं संवेदनाओं को निर्विरोध स्वीकार कर अपनी मानवीय प्रतिबद्धता के प्रामाणिक रूप से स्थापित किया है। स्वतंत्रता के तुरंत बाद लिखी गई कविताओं में मानवीय गुणों की चर्चा व्याप्त है। जिसमें मानवता का संदेश प्रमुख है। एक-दो दशकों बाद रची गई कविताओं में मानव अस्तित्व की बात को प्रबलता से उठाया गया है। इस अस्तित्ववादी विचारधारा में मानव की प्रतिष्ठा को ईश्वर से अधिक मान्यता प्रदान की गई है। कहने का तात्पर्य यह है कि मानवीय अर्थवत्ता ही सर्वोपरि रूप से कवियों ने स्वीकार की है। तमाम विश्व का सौन्दर्य चाहे प्राकृतिक हो या मानवी व्यवहारगत मानवता के परिप्रेक्ष्य में नितांत विकसित होता है। इसी लिए स्वातंत्रयोत्तर काल के कवियों ने मानवतत्व पर बल देते हुए उजागर एवं छद्म मूल्यों को अपनी कविता के विवेच्य विषय के रूप में सहज स्वीकार किया है।
नवीन मानवतावादी विचार-भूमि के परिप्रेक्ष्य में ऐसे मानव की कल्पना नहीं है, जो स्वयं ही पुरूषार्थ बल से नियन्ता भी बन गया है। मानव ऐसी सर्वोपरि शक्ति (अथवा ईश्वर) से निर्मित अति सुन्दर कृति है, जो सभी प्राणियों में सर्वोत्तम एवं उत्कृष्ट है फिर भी वह ईश्वर नहीं है। मानवतावाद ने थोड़े बहुत अंतर से ईश्वर की सत्ता को सदैव माना है। इसलिए कवियों ने मानवता की मूल्यवत्ता को तमाम मानवीय गुणों का स्त्रोत मानते हुए जीवन की नैतिकता और अनैतिकता में स्पष्ट रूप से भेद प्रकट करते हुए कविता का सृजन किया है।
कविता में सौन्दर्य कई प्रकार से निहित होता है। हालांकि कविता की प्रकृति सौन्दर्य अवलम्बित ही होती है। सामान्यतः भावगत एवं कलागत सौन्दर्य के बारे में निरंतर चर्चा होती रहती है। परन्तु कविता में मूल्यगत सौन्दर्य की बात अपना अलग ही स्थान रखती है। आधुनिक जीवन, खास-तौर से स्वतंत्रता के बाद का जीवन भयानक विकृतियों के दौर से गुजर रहा है। अतः ऐसे में कवि की मूल्यगत सौन्दर्य के प्रति चिंता बढ़ जाती है। स्वतंत्रता के बाद तमाम भारतीय कवियों ने मानवीय जीवन में मूल्यगत सौन्दर्य की आवश्यकता को समझते हुए उत्कृष्ट से उत्कृष्ण एवं गर्हित से गर्हित विषयों को उठाकर मानव के वर्तमान एवं भविष्य की मंगलमयता पर विचार करते हुए मूल्यों की अनिवार्यता, धारकता एवं व्यवहारिकता की पारिणामिक सभी दशाओं से परिचित कराने का अपनी कविता के माध्यम से भरसक प्रयत्न किया है।

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