International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 3 (2018)

मन्नू भंडारी और उशा प्रियंवदा की कहानियों में विवाहित और अविवाहित स्त्रियों की छवि की विवेचना

Author(s): कु. कांता राधवानी, डाॅ. नीता सिंह
Abstract:
प्राचीन काल में नारी को क्षमा, तेज, गंभीर, शीतल तथा उच्च स्वरूपिणी माना जाता था। लेकिन समय के परिवर्तन के अनुरूप नारी का रूप बदल गया। सुशिक्षित नारी ने नौकरी करना शुरू की। आर्थिक रूप से स्वतंत्र नारी परिवार में पति की सहयोगी सिद्ध हुई। मन्नू भंडारी की सशंक्त तुलिका भारतीय नारी के इन बदलते स्वरूपों का सटीक चित्रण करने में सक्षम रही हैं। मन्नू भंडारी स्वातंत्र्योत्तर कथा-साहित्य की बहुचर्चित महिला लेखिका हैं। वह नारी जीवन के मूक क्षणों को वाणी देने में सक्षम दिखती है। मन्नू जी की रचनाओं में नारी के विभिन्न पारिवारिक रिश्तों और व्यापक सामाजिक संदर्भों का अंकन हुआ है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों से बदलते सामाजिक स्थिति के प्रति सजग नारी को गढ़ा है।
उशाजी के कथा साहित्य में पाश्चात्य प्रभाव अधिक मात्रा में है। उनका कथा साहित्य आधुनिकता से ओत-प्रोत है। पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव आधुनिक भारतीय जीवन का अभिन्न अंग है। वह परंपरागत जीवन के सभी बंधनों को तोड़कर आधुनिक जीवन जीती हुई प्रतीत होती है। उनकी रचनाओं में चित्रित स्त्री स्वंतत्र रूप से अपनी सार्थकता की तलाश कर रहीं है। उनकी स्त्रियाँ ‘‘मैं इस पुरूष के लिए क्या हूँ’’ यह नहीं देखती, बल्कि ‘‘मैं क्या हूँ’’ यह देखती है। पहला वाक्य स्त्री की सार्थकता को पुरूष के साथ जोड़कर देखने का है, जो परंपरागत है, और दूसरा वाक्य स्त्री की अपनी पहचान आप नहीं बना पाएगी तब तक समाज की नजरों से नहीं देखेगा। यह वाक्य स्त्रियों को प्रतिश्ठित करने का सूत्र वाक्य है। लेखिका स्त्री की सम्मानित छवि का निर्माण करने का प्रयास कर रही हैं, यही उनके साहित्य की विशेषता है।
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