International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 4 (2018)

समाजवादी एंव यथार्थपरक सामाजिक उपन्यासों में अभिव्यक्त जीवनदर्शन

Author(s): डाॅ0 दिलीप कुमार झा
Abstract: प्रेमचंदोत्तोर युग में हिन्दी - उपन्यास को उत्कर्ष प्रदान करने में दो प्रवृतियों - मनोविश्लेषणात्मक यथार्थवाद तथा सामाजिक यथार्थवाद का विशेष योगदान रहा। सामाजिक यथार्थवाद का अंकुर गोदान में दिखलाई पड़ता है। बाद में वह विकसित हुआ। एक वर्ग महात्मा गाँधी, नेहरू एंव अरविन्द आदि से प्रेरणा ग्रहण करके सामाजिक तथा समष्टि जीवन के यथार्थ को अपने उपन्यासों में प्रकट कर रहा था। यह वर्ग भी सामाजिक बुराइयों को दूर करने तथा समाजवाद लाने का प्रयत्न कर रहा था, किन्तु शांति के द्वारा। दूसरा वर्ग, माक्र्स से प्रेरणा ग्रहण करके सामाजिक यथार्थ को प्रकट कर रहा था तथा रक्तक्रांति के द्वारा समाजवाद लाने का उद्घोष कर रहा था। इसलिए हिन्दी-उपन्यास-साहित्य में माक्र्सवादी सामाजिक उपन्यास (समाजवादी उपन्यास) एंव यथार्थपरक सामाजिक उपन्यास की परंपरा चली, जो स्वभाविक थी।
Pages: 28-29  |  1050 Views  528 Downloads
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