International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 5 (2018)

जीवन की शुचिता का धर्म: श्रेष्ठ मानव व्यवहार का योगदान - आत्मिक पवित्रता के संबंध में एक विशिष्ट अध्ययन

Author(s): मेधावी शुक्ला
Abstract: प्रस्तुत शोध आलेख में मानव की सम्पूर्णता के विराट स्वरुप का अत्यंत ही सात्विक तरीके से वर्णन किया गया है जिसमें जीवन की शुचिता को बनाये रखने के पवित्रतम भाव को अक्षुण्य रखने की निजी जिम्मेदारी से जुड़े कर्तव्य बोध को प्रमुख तथ्य के रूप में प्रकट किया गया है । अंतर्मन की जीवंत अभिप्रेरणा व्यक्तिगत जीवन के भीतर सामान्यत: नैतिकता के बल को स्थापित कर देती है जिसके परिणाम श्रेष्ठ मानव व्यवहार के रूप में परिलक्षित होते हैं जो आत्मिक पवित्रता का प्रमुख कारक बनकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सामाजिक जीवन में निष्ठा से निभाते हैं । स्वयं के प्रति अहिंसक व्यवहार की परिकल्पना जब जीवन के धर्म - कर्म से सम्बद्ध होकर आंतरिक एवं बाह्य जगत को सद्व्यवहार की उज्ज्वलता से पोषित करने में सफल हो जाती है तब व्यक्तिगत पुण्यों की पूंजी को स्थायी रूप से स्वीकार कर लिया जाता है । जीवन की शुचिता का नैसर्गिक धर्म मूलतः आत्मा की पवित्रता से सबंधित होता है जो जीवन के मर्म को संवेदनशील अभिव्यक्ति द्वारा मानव कल्याण के लिए समर्पित कर देने की महान परम्परा से सम्बद्ध होकर सदा गतिशील रहता है । आत्मिक पवित्रता के संदर्भ का सूक्ष्म विश्लेषण उन स्थितियों में मुखरित होता है जब जीवन की सात्विकता के अध्यात्म का नवीनतम अध्याय श्रेष्ठ मानव व्यवहार की प्रासंगिकता को बहुआयामी स्वरुप करके जीवन की शुचिता को अक्षुण्य बनाये रखने में सफलता प्राप्त कर लेता है । यह शोध आलेख मानवीय संवेदनशीलता से सम्बद्ध गरिमा को उसके वास्तविक स्वरुप में स्थापित कर जीवन की शुचिता को श्रेष्ठ मानव व्यवहार के विशिष्ट योगदान से निरुपित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा जिससे आत्मिक पवित्रता के स्वरुप की व्यावहारिकता व्यक्तिगत जीवन में सदैव अखंडित बनी रहेगी ।
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