International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 5 (2018)

मंगलेश डबराल की कविता में यथार्थ का चित्रण

Author(s): पी. ए. देवस्या
Abstract: मंगलेश डबराल की काव्ययात्रा विशेष रूप में सामाजिक यथार्थता से ही शुरू होती है। किसी भी साहित्यकार की साहित्य सामाजिक यथार्थ से असंपृक्त और अप्रभावित नहीं रह सकता। बेकारी, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता आदि का चित्रण आज की कविता में खूब देखने को मिलता है। समकालीन हिन्दी कवियों ने ग्राम्य जीवन के यथार्थ चित्रण के साथ ही साथ नागरिक जीवन के विभिन्न अंगों, रूपों और विद्रूपताओं एवं विसंगतियों का भी विस्तृत अभिव्यक्ति दी है। शोषित वर्ग के बाद समाज के सबसे बडा वर्ग मध्यवर्ग है। यह मध्यवर्ग वर्तमान पूँजीवादी समाज व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है जो शोषकों और शोषितों के बीच त्रिशंकू की तरह स्थित है, यह यथार्थ चित्रण डबराल की कविता में देख सकते हैं। डबराल की कविता में साधारण जनता की दुख-दर्द, बेचैनी, पूँजीवादी विसंगतियाँ, निम्न तथा मध्यवर्गीय जीवन की तमाम सच्चाइयाँ आदि आते हैं। उन्होंने उन विसंगतियों पर द्यातक प्रहार तथा समाज सुघार का सार्थक प्रयास भी किया है। उनकी अधिकांश रचनायें समाज की सच्चाइयों और यथार्थ से भरा हुआ है। उनके काव्य की मुख्य चिंता है कि भूख और तडप से मनुष्य के अन्दर व्यवस्था के विरुद्ध जो गुर्राहट उभरनी चाहिए वह मंद क्यों हो जाती है। वास्तव में लोग अंधेरे में हाँफते हुए ही चुपचाप चले जाते हैं, औरतें डरी डरी अपना डर छुपाती निकल जाती हैं। उनकी रचनायें अपने अनुभव पर आधारित होने के कारण उनमें जीवंतता झलकती है। उन्होंने जीवन के अनुभव को ही अर्थात कटुसत्य को निर्दयता के साथ निर्भय होकर सामाजिक व्यवस्था का चित्रण किया है। मंगलेश समाज का अत्याचार, अन्याय, कुंठा, शोषण, हिंसात्मक कृत्य, बाज़ारवाद आदि का चित्रण समाज के सम्मुख रखते हैं। आज समाज काफी बदल चुका है। पूरी दुनिया में बाज़ारवाद हावी है, जहाँ मनुष्य का न सम्मान है, न उसके रिश्तों का। इन सभी बातें पर खेद करने हुए कवि एसी परिस्थितियों पर नितांत चिंतन-मंथन करते हुए समस्या का समाधान ढूँढने का प्रयास और साथ ही समाज को जगाने का प्रयत्न भी करते हैं।
Pages: 26-27  |  589 Views  190 Downloads
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