International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 4, Issue 6 (2018)

जैन यतिधर्म में स्त्री का स्थान

Author(s): साध्वी अनुग्या
Abstract: जैन दर्शन के आधार पर जीने की प्रक्रिया ही जीवन है। प्रत्येक प्राणी की क्रमश: तीन मुख्य अवस्थाएं होती हैजन्म जीवन और मृत्यु। अत: जीवन कुछ नहीं, जन्म और मृत्यु के बीच की अवस्था है। इन तीनों अवस्थाओं में जीवन का महत्व विशिष्ट है,क्योंकि जन्म और मृत्यु तो क्षणिक है। और इन पर प्राणी का कोई बस नहीं चलता जबकि जीवन अपेक्षाकृत दीर्घ होता है। और इसके पल्लवन,पोषण,संवर्धन एवं विकास के लिए प्राणी स्वतन्त्र होता है। जैन जर्शन आत्मवादी,लोकवादी, कर्मवादी एवं क्रियावादी दर्शन है। जिसमें यह माना गया कि जीवात्मा अपने पूर्वकृत कर्मो के अनुसार पूर्वजन्म को समाप्त कर नवीन शरीर को धारण करता है और एक निश्चित अवधि तक इसमें जीकर अगले जन्म के लिए प्रस्थान करता है। जैन दर्शन में जीवन की व्याख्या दो दृष्टियों से की गई हैआध्यात्मिक और व्यावहारिक आध्यात्मिक-दृष्टि(निश्चय-दृष्टि) आत्मा को ही जीवन का एकमात्र कारण मानती है। और उसके अनुसार यह जीवन जीव का ही कार्य है। क्योंकि जो जीता है, वह वास्तव में जीव ही है। व्यावहारिक-दृष्टि आत्माऔर शरीरदोनों को जीवन का प्रमुख घटक मानती है । उसके अनुसार यदि आत्मा जीवन की अंतरंग अभिव्यक्ति है जो शरीर जीवन की बाह्य अभिव्यक्ति है । पूर्णत:निवृत्ति-प्रधान होने के कारण जैन दर्शन यह मानना है। कि मोक्ष ही जीवन का परम-पुरुषार्थ एवं परम-साध्य है। धर्म,अर्थ और काम से परम सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती जब ऐसा विवेक जागृत हो जाता है। अत: मोक्ष-प्रयत्न ही श्रेष्ठ है। ऐसा मानकर इस मार्ग का चयन किया जाता है। उत्तर आधुनिक परिवेश में विमर्श को मुख्यत: तीन दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है : वर्ग,वर्ण एवं लिंग। अत: प्रस्तुत आलेख के माध्यम से जैन धर्म के आध्यत्मिक पक्ष में स्त्री के स्थान तथा महत्व की चर्चा का प्रयास रहा है। जैन धर्म में व्य्ख्यायित आध्यात्मिक मार्ग का पालन करने का अधिकार स्त्री को दिया गया है या नहीं,श्रमणियों की परंपरा तथा मुक्ति मार्ग की आकांक्षा में जैन स्त्रियां निवृत्ति का मार्ग अपनाने का अधिकार रखती हैं या नहीं,क्या श्रमणों से उनका मार्ग भिन्न है आदि प्रश्नों के प्रत्युत्तर में किए गए लघु शोध प्रबंध का अंश यहां प्रस्तुत किया गया है।
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