International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 5, Issue 2 (2019)

दिलो दानिश उपन्यास में सामंती परिवेश और स्त्री की स्थिति

Author(s): कल्पना सिंह राठौर
Abstract: भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है, यहाँ स्त्रियाँ हमेशा ही एक ऑब्जेक्ट या वस्तु की तरह समझी गयी हैं । कभी वह मनोरंजन का जरिया रही हैं, तो कभी युद्धों की वजह । दिलो दानिश उपन्यास का कलेवर आजादी-पूर्व की सामंती व्यवस्था की चौहद्दी में स्त्री की स्थिति को उभरता है। आजादी से पहले की सामाजिक व्यवस्था में रईसों का कई स्त्रियों से सम्बन्ध होना सहज स्वीकार था । सामंती समाज व्यवस्था में स्त्री, घर, जमीन और जानवरों की तरह पुरुषों की सम्पत्ति मानी जाती थीं । स्त्रियों के पैत्रक सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं हुआ करते थे । वे आजीवन पिता, पति और पुत्र के आधीन रहने को मजबूर थीं । उपन्यास की कहानी एक सामंती हवेली और रईस समाज व्यवस्था से ताल्लुक रखती है लेकिन कृष्णा सोबती ने जिस रचनात्मकता और तटस्थ आत्मीयता के साथ उसकी अच्छाइयों और बुराइयों का चित्रण किया है वह बेजोड़ है । उपन्यास की तीनों स्त्रियाँ अपनी-अपनी हद से सामंती व्यवस्था को अस्वीकार करती हुयी दिखाई देती हैं । कुटुंब प्यारी, महक बानो और छुन्ना तीनों में से कोई भी जस की तस परिस्थति को स्वीकार नहीं करती हैं, वे अपने परिवेश को अपने लायक बनाने का भरसक प्रयास करती हैं । उपन्यास जड़ परिवेश में सशक्त हस्तक्षेप करता है । यह उपन्यास की लेखिका की रचनात्मकता है कि वे ऐसे घोर सामंतवादी परिवेश के समानान्तर इतने जुझारू स्त्री पात्र खड़े कर पाने में सफल होती हैं । दिलो-दानिश उपन्यास को प्रेम, सामाजिकता और जीवन के सुख-दुःख की छोटी-बड़ी कहानियों का संगठित बिम्ब कहा जा सकता है ।
Pages: 06-08  |  995 Views  289 Downloads
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