International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 5, Issue 4 (2019)

प्रदर्शनकारी कला (फ़िल्म एवं थियेटर) : वर्तमान परिदृश्य और शैक्षणिक विस्तार

Author(s): अभिषेक त्रिपाठी
Abstract: प्रदर्शनकारी कला (फ़िल्म एवं थियेटर) अब तक की अपनी विकास यात्रा में अनेक पड़ावों से होकर गुजरी है,और अब भी निरंतर अपने यात्रा पथ पर गतिशील है। इस यात्रा के परिणामतः इसके रूप-स्वरूप और स्वीकृति की सीमाओं में काफी कुछ परिवर्तित हुआ है। कभी कला सिर्फ कला के लिए थी;इसका सिर्फ आनंददायी रूप ही सर्वोपरि था। कालांतर में कलाओं के इस सीमा को विस्तृत कर इसे समाज के लिए एक जिम्मेदार कारक की भूमिका भी प्रदान कर दी गई। आज कला इससे भी आगे बढ़कर ज्ञान-विज्ञान के संप्रेषण का भी एक सशक्त जरिया बन रही है,और इसके जरिये अध्ययन-अध्यापन का कार्य संपन्न किया जा रहा है। अध्ययन के विषय-विशेष के रूप में तो यह अस्तित्व कायम किए हुये है ही,इससे आगे बढ़कर यह अन्य विषयों के संबंध मे आसान समझ बनाने का भी एक जरिया बन चुकी है। प्रदर्शनकारी कला की सहायता से अन्य अनुशासनों की समझ भी विद्यार्थियों को दी जा रही है। अपने यात्रा के दौर में वर्तमान में प्रदर्शनकारी कला (फ़िल्म एवं थियेटर) में तमाम तरह के बदलावों को भी चिन्हित किया जा सकता है। तकनीकी की पैठ इनका वर्तमान यथार्थ है। बात चाहे थियेटर की करें,या फ़िल्म की;प्रत्येक स्थल पर तकनीकी अपनी महत्ता स्थापित कर रही है। फ़िल्म तो मूलतः तकनीकी की विधा है,और इस कारण इसमें नई-नई तकनीकें निरंतर शामिल हो ही रही हैं,पर रंगमंच भी इसमें प्रयोग को लेकर तत्पर है। तकनीकी के अतिरिक्त अन्य दूसरे प्रयोग भी इन कला विधाओं में देखे जा सकते हैं। इस अध्ययन में प्रदर्शनकारी कला (फ़िल्म एवं थियेटर) के वर्तमान परिदृश्यों (बदलावों के संबंध में) को समझते हुये वर्तमान समय में इसके एक अति महत्वपूर्ण आयाम शिक्षा;तथा शिक्षण के साधन के रूप में इसकी उपयोगिकता की विवेचना की गई है।
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