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VOL. 5, ISSUE 5 (2019)
वैदिक साहित्य और पारिस्थितिकी विमर्श
Authors
ध्रुव कुमार
Abstract
वैदिक साहित्य आदिकाल से ही मानव जाति को सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा और प्रेरणा देता रहा है. वेदों में अनेकानेक ऋषियों मुनियों की सहस्राधिक वर्षों की तपश्चर्या और साधना का प्रतिफल विद्यमान है जो आज २१वीं सदी में भी हमारे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. आज वेद का नाम आने पर हमारे मानस में एक ऐसे साहित्य की छवि निर्मित हो जाती है जो धार्मिक, कर्मकांडी अथवा देवताओं को समर्पित है. जबकि वास्तविकता यह नहीं है. यह वेदों का एक अंश मात्र है. वेदों में इसके कई गुना मात्रा में पर्यावरण, गणित, भूगोल, विज्ञान, रसायन तथा भौतिकी विद्यमान है. वर्तमान समय में हमने वेदों के असली स्वरुप को भुला दिया है और हम कृत्रिम विकास को प्रगति की परिभाषा दे बैठे हैं. यह कृत्रिम विकास न केवल मानव समाज बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी और उस पर रहने वाले सभी जीव जंतुओं के लिए विनाशकारी है. अब हम इसका तीव्र गति से अनुभव भी करने लगे हैं. ऐसी स्थिति में हमें पुन: उन्हीं वेदों की ओर वापस लौटकर अपने जीवन, समाज तथा राष्ट्र को सुखी, शांत तथा समृद्ध बनाने प्रयास करना चाहिए.
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Pages:24-26
How to cite this article:
ध्रुव कुमार "वैदिक साहित्य और पारिस्थितिकी विमर्श". International Journal of Hindi Research, Vol 5, Issue 5, 2019, Pages 24-26
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