International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 5, Issue 5 (2019)

‘अपवित्र आख्यान’ में निहित सामाजिक अंतर्द्वन्द्व

Author(s): नवीन सिंह
Abstract: उपन्यास ‘अपवित्र आख्यान’ का शीर्षक ही इस बात का द्योतक है कि समाज में कुछ ‘पवित्र’ है और कुछ ‘अपवित्र’। इन्हीं दो तत्वों के आधार पर समाज में विभाजन की शुरूआत हो जाती है जिसके बाद अंतर्द्वंद्व की स्थिति पैदा होती है। हिंदू के लिए मुसलमान अपवित्र है, म्लेच्छ है तो मुसलमान के लिए हिंदू ‘काफिर’। धर्म, जाति, लिंग, भाषा व अन्य सामाजिक उपकरणों (तत्वों) ने आज ‘मनुष्य’ की पहचान को धूमिल कर दिया है। हम हिंदू होते हैं, या मुसलमान होते हैं, हम ब्राह्मण होते हैं या दलित होते हैं, हम पुरुष होते हैं या स्त्री होते हैं, हम हिंदुस्तानी होते हैं या पाकिस्तानी होते हैं और हिंदी भाषी होते हैं या उर्दू भाषी होते हैं लेकिन इन सबके बीच ‘इंसान’ होना भूल जाते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते हुए व्यक्ति, परिवार, समुदाय और राष्ट्र के रूप में हमारी पहचान और संस्कृति विकसित होती जाती है। इसमें बहुत सारे तत्व एक समाज से दूसरे समाज में स्थानांतरित होते रहते हैं।
Pages: 27-31  |  494 Views  146 Downloads
download hardcopy binder