International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 5, Issue 5 (2019)

प्रगतिशील काव्य धारा और त्रिलोचन का काव्य विश्लेषण

Author(s): डॉक्टर श्रीमती अनुपमा शर्मा
Abstract:
कविवर त्रिलोचन शास्त्री का सरल जीवन एवं उनकी असाधारण कृतियांए जिंदगी से गुफ्तगू करती कविताएँ, देसी संस्कार के बेेबाक कवि त्रिलोचन, प्रकृति के कवि त्रिलोचन, जनता की आस्था के कवि त्रिलोचन, जीवन के यथार्थ को जीते त्रिलोचन का व्यापक काव्यफलक है।
त्रिलोचन शास्त्री संभवतः आधुनिक हिन्दी कविता में अपनी दरिद्रता को हिला देने वाले फिर भी नियंत्रित और कहीं भी गरिमाच्युत नहीं हुए। त्रिलोचन के कृतित्व में जीवन के खुरदरे यथार्थ हैं, पूरी कविता का मिजाज है स्थिरता और स्थिर चित्तता।
अंग्रेजी की प्रसिद्ध साॅनेट कला को सर्वप्रथम हिन्दी में त्रिलोचन जी ने ही प्रयोग किया है। त्रिलोचन न केवल हिन्दी भाषा के ही मर्मज्ञ हैं, वरन अन्य भाषाओं के गुण-धर्मों के भी पारखी हैं। उनकी साॅनेट कला का सृजनात्मक ओज इसका पुष्ट प्रमाण हैं।
त्रिलोचन का रचना-संसार अपनी खास भारतीय मिजाज को हर कीमत पर बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उनकी रचना अपनी ठोस जमीन और ठेठ भाषा से हमेशा जुड़ी हुई है। समकालीन कवियों जैसे नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, पंत, निराला, शमशेर आदि में सबसे अधिक सरलता, सहजता और ईमानदारी उनकी रचना-शीलता के प्राण-तत्व के रूप में पायी जाती है।
प्रगतिशील काव्य धारा भी अंतिम श्रेणी के कवि त्रिलोचन माक्र्सवादी चेतना से पूर्णतः प्रभावित एवं सामाजिक यथार्थ को अधिक महत्व देने वाले हैं। यथार्थता कविताओं के साथ कहानियों में भी झलकती है।
त्रिलोचन की रचना में प्रगतिशीलता का सानिध्य जनमुक्ति के एक जीवन्त प्रेरणास्त्रोत के रूप में हुआ है जो उनकी संवदेना को भारतीय यथार्थ के दृढ़ आधार पर स्थापित करती है।
Pages: 60-63  |  430 Views  67 Downloads
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