International Journal of Hindi Research


ISSN: 2455-2232

Vol. 5, Issue 6 (2019)

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरितमानस में अरण्यकांड का अध्ययन

Author(s): कुमार॰ सुविद्य विनायक धारवाडकर
Abstract: हिन्दी साहित्यकारों ने हिन्दी साहित्य को सही तरीके से विश्लेषित करने हेतु उसे तीन कालखण्डों में विभाजित किया हैं। वह तीन कालखंड आदिकाल, मध्यकाल एवं आधुनिक काल कहलाते हैं। अगर हम संक्षिप्त में प्रत्येक काल-खंड का वर्णन करें तो- § आदिकाल में हिन्दी साहित्य का अभिर्भाव काल, प्राकृतभास हिन्दी के सबसे पुराने पद्य, आदिकाल की पूर्णावधि, लोकवृत्ति, साहित्यिक सामाग्री अपभ्रंश परंपरा आदि देखने मिलती है। § मध्यकाल दो भागों में विभक्त हैं- भक्तिकाल अपने काल-खंड की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थिति,भक्ति प्रवाह, सगुण भक्ति परंपरा, निर्गुण भक्ति परंपरा आदि का साक्षी हैं। § रीतिकाल रीति परम्पराओं के आरंभ का साक्षी हैं तो § आधुनिक काल गद्य-निबंध साहित्य,भारतेन्दु युग का प्रत्यक्षदर्शी हैं। विषयवस्तु सगुणधारा रामभक्ति काव्य धारा पर होने के कारणवश उसी कालखंड पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक हैं। भक्ति से उत्पन्न साहित्य संसार का सर्वश्रेष्ठ साहित्य माना गया है। उनकी भक्ति ने संसार के समक्ष यथोचित उदाहरण प्रस्तुत किया है।भक्ति काव्य का हिन्दी साहित्य में अपना विशेष स्थान हैं क्योंकि इसी युग के रससिद्ध कवियों ने भाव के क्षेत्र में अल्लादकारिणी भाव धारा को बहाया तथा सुप्त जनता को जागृत करने का प्रयास किया जिसका अध्ययन करना आवश्यक हैं।रामभक्ति शाखा में महाकवि तुलसीदास का स्थान शिरोमणि हैं।
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