International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 2 (2020)

आज के परिप्रेक्ष्य में आत्मविश्वास से भरी देेह से परे नारी


Suniti Tyagi

21 वीं सदी में सारे विश्व में नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की शुरूआत हो चुकी है। आज की स्त्री की नियति को रोक पाना किसी संस्था अथवा समाज के बूते की बात नहीं है। पुरूष के द्धारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है परन्तु सत्य नहीं है। नारी अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र दे सकती है वैसा पुरूष साधना के उपरांत भी शायद ही दे सके। प्रत्येक नारी को अपने जीवन पर गर्व होना चाहिए,और स्वीकार करना चाहिए कि उसका शरीर केवल भार नही है कोई मिट्टी का ढेला नही है यह उससे बड़ा है विधाता ने उसे बनाया था तो उसका उद्देश्य उसे दण्ड देना नही था बल्कि एक नारी बनाकर विधाता ने उसका उद्धार किया है। कामकाजी महिलाओं को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। नारी की आलोचना प्रत्येक युग में किसी ना किसी रूप में होती रही है। समाज में निश्चित स्थान बनाने वाली प्रत्येक महिलाओ के सामने व्यक्तित्व टकराव की समस्या सैदव बनी रहती है। पिछले कई दशको से सांस्कृतिक बदलाव पर चर्चा चलती रही है। और उसमें नारी की स्थिति का मुद्दा केंद्र में रहा। आज की नारी परम्पराओं से और उसके बनाए नियमों से जूझ रही है परन्तु आत्मनिर्भर होती स्त्रियों ने अब इस व्यवस्था से निबटने की रणनीति अपने अपने स्तर पर तय करनी शुरू कर दी है। स्त्री खामोश रहती है। हाॅ, जब उसकी खामोशी टूटने लगती है तो बहुत कुछ ऐसा अभिव्यक्त होता है जिसे अभी तक शब्द ही नहीं दिए गए। देह में क्या धरा है यह तो नश्वर है यही हमारी भारतीय परम्परा है जो इस नश्वर चीज के इर्द-गिर्द घूमती है। परम्पराओं के चक्रव्यूह में फॅस कर इसकी जरूरतों को नकारा जाता है। आज नारी के लिए ज्ञान के सारे अवसर खुले हुए है। आज के परिप्रेक्ष्य में नारी भारतीय समाज की एक समर्थ और स्वतंत्र इकाई बनती जा रही है किसी भी चुनौती दुविधा और बाधा का पूरी तरह सामना करने और उनसे दो चार होने का साहस स्त्री कि लिए उतना दुलर्भ नही है। जितना पहले था
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