International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 5 (2020)

अर्थ की अवधारणा-अपोहवाद: धर्मकीर्ति के विशेष सन्दर्भ में


श्रुति शर्मा

गौतम बुद्ध के अंगुत्तर निकाय (३,१,३४) के ‘अनित्य, दुख, अनात्म’ इस एक सूत्र में भगवान बुद्ध का सारा दर्शन समाविष्ट है| उन्होंने क्षणिकवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद आदि सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, जिसका आगे चल कर अन्य बौद्ध दार्शनिकों द्वारा विस्तार से वर्णन किया गया| क्षणिकवाद बौद्ध दर्शन का मुलभुत सिद्धांत है| जिसके अनुसार- इस विश्व की कोई भी वस्तु न ही पूर्ण नित्य है और न ही पूर्ण अनित्य| वस्तु का निरंतर परिवर्तन होता रहता है और कोई भी पदार्थ एक क्षण से अधिक स्थायी नही रह सकता है| उनके अनुसार- जो क्षणिक है वही सत् है-“यत् क्षणिकं तत् सत्”| इसी सिद्धांत से अनित्यवाद का सिद्धांत निकल कर आया, जिसके अनुसार सभी वस्तुएं अनित्य है| इससे सामान्य की स्थापना नही हो सकती| सामान्य का अर्थ- किसी वर्ग की सभी वस्तुओं अथवा व्यक्तियों में पाया जाने वाला सर्वगत लक्षण या धर्मं है, जैसे विभिन्न गायों में पाया जाने वाला सामान्य लक्षण “गौत्त्व” है| अतः अनित्यवाद सिद्धांत की स्थापना के लिए बौद्ध दार्शनिकों के लिए यह अनिवार्य हो गया की वह सामान्य का प्रबल रूप से खण्डन करे| इसके आधार पर उन्होंने अपोहवाद की स्थापना की| पुनःश्च अपोहवाद बौद्ध दर्शन का भाषा दर्शन विषयक सिद्धांत है, जिसके अनुसार जब कोई शब्द बोला जाता है, तो वह असंख्य संभावित अर्थों को अपोहित करके अर्थ शेष रहने देता है और वही उस शब्द का अर्थ कहा जाता है| उनके अनुसार शब्द न ही सामान्य का वाचक है न ही विशेषों का| यह केवल अतद्-व्यावृत्ति या तदभिन्नभिन्नत्व के द्वारा विकल्पित विषय को ही सूचित करता है | इस प्रकार अपोहवाद का सम्बन्ध न केवल सामान्य के खण्डन से है बल्कि शब्द-अर्थ सम्बन्ध से भी है| अतः प्रस्तुत शोध पत्र में अपोहवाद की अवधारणा को धर्मकीर्ति के विशेष सन्दर्भ में समझने का प्रयास किया जायेगा|
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