International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 5 (2020)

वसिष्ठ संहिता मे यम और नियम का स्वरूप एक अध्ययन


ज्योति शर्मा, प्रो. गणेश शंकर गिरि

विश्व मे वेद को प्राचीन एंव सर्वोपरि माना जाता है मोक्षप्राप्ति के लिए योग,योगविधि ध्यान योग की उपयोगिता बताई गई है। वैदिक परम्परा का अनुवर्ती योग का कोई प्रमाणिक ग्रन्थ आज हमारे पास उपलब्ध नही है।फिर भी यह अपूर्णता उपलब्ध दो ग्रन्थो से बहुत मात्रा मे पूर्ण होती है।प्रथम ग्रन्थ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति तथा द्वितीय ग्रन्थ वसिष्ठसंहिता ।पहला ग्रन्थ 1951 ईस्वी मे कै.श्री.मा.यो दृम.समिति,लोनावला की ओर से प्रकाशित हो चुका है और यह दूसरा वसिष्ठसंहिता योगमीमांसा भाग-8 संख्या-2 से भग -10संख्या-1 तक क्रमशःप्रकाशित हो चुका है इसका पुस्तक के रूप मे सर्वप्रथम प्रकाशन 1961 ईस्वी मंे अंग्रेजी अनुवाद के साथ यही से हुआ था।यह ग्रन्थ प्रसिद्ध योगवसिष्ठ,वसिष्ठ -धर्मसूत्र तथा वसिष्ठ स्मृति आदि से सर्वथा भिन्न ग्रन्थ है।
जैसेे ही वसिष्ठ संहिता का नाम आता है तो लोग उसे योग वसिष्ठ से जोड़ने लगते है परंतु यह योग वसिष्ठ से भिन्न ग्रन्थ है जिसमे अष्टांग योग का स्पष्ठ वर्णन मिलता है योग के बहुत से ग्रंथ है लेकिन किसी मे भी वैदिक आचार का परिपालन सही ढ़ग से नही मिलता है वैदिक आचार का परिपालन मुमुक्ष के लिए बहुत आवश्यक है। वसिष्ठ जी अपने ग्रंथ मे प्रवर्तक और निवर्तक कर्म के बारे मे बताते हैं।वसिष्ठ जी कहते है केवल ज्ञान या कर्म से मोक्ष प्राप्त नही होता है दोनो का अनुसरण ही अन्तिम लक्ष्य तक ले जाने मे समर्थ है।
आज के समय मे मनुष्य कर्म करता है लेकिन ज्ञान अर्जित नही करता है तो कर्म नही करता इसलिए वह दुःखी है अगर मनुष्य दोनो का अनुसरण करंे तो वह अपने जीवन को सुखी बनाकर उस परमांनद से जुड सकता है जो सभी दुःखो की निवृति करता है।वसिष्ठ संहिता मे बताए गए यम,नियम,हमे नैतिकता मूल्य प्रदान करते है कि हमारे लिए क्या आवश्यक है क्या आवश्यक नही है वह जीवन को सरल और आनंदमय बनाते है अगर यम,नियम का अनुसरण किया जाए तो व्यक्ति कर्म के साथ ज्ञान भी अर्जित कर सकता है और अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है और छोटी-छोटी बातों से विचलित नही होएगा।वह अपने साथ समाज के विकास मे भी सहयोग कर पाऐगा।उसके लिए अष्टांग योग के यम,नियम का अनुसरण करना अति आवश्यक है जो उसको एक अच्छे नगरिक बनने मे मदद करते है।
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