International Journal of Hindi Research

International Journal of Hindi Research


International Journal of Hindi Research
International Journal of Hindi Research
Vol. 6, Issue 5 (2020)

काशीनाथ सिंह के कथा साहित्य में सांस्कृतिक विमर्श


सुधा कुमारी

साठोत्तर पीढ़ी के साहित्यकार काशीनाथ सिंह हिन्दी साहित्य के समकालीन लेखकों में सर्वाधिक चर्चित और प्रासंगिक प्रतीक होते हैं तो इसका एक मात्र कारण उनका जादुई शिल्प एवं बेलौस-बेबाक भाषा ही नहीं है बल्कि वो प्रखर दृष्टि है जो आधुनिक मानवीय समस्याओं से मुक्ति की राह प्राचीन भारतीय संस्कृति के सहारे तलाशता है। काशीनाथ सिंह की कहानियों, उपन्यासों, संस्मरणों आदि में न सिर्फ सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं का प्रतिबिम्ब नजर आता है वरन् नवीन साहित्यिक प्रयोग भी सहज ही दृष्टिगोचर जो जाता है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह कि ये कहीं भी अपने आपको दोहराते नहीं है। इनकी हर रचना अपने आप में अनूठी है और ऐसा प्रतीत होता है हकि इसके लेखक अलग-अलग हैं। काशी का अस्सी’ पढ़नेवाला पाठक जब ‘उपसंहार’ पढ़ता है तो उसे फक्कड़, मस्तमौला और ठेठ देहाती गाली उच्चारित करनेवाला लेखक काशीनाथ सिंह के दार्शनिक व्यक्तित्व भान हो जाता है। हिन्दी साहित्य में काशीनाथ अपनी प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते हैं और अपने अंदजे बयाँ की गजब भाषा शौली में जितने प्रयोग इन्होंने किया है वैसा अन्य किसी भी लेखक ने नहीं किया है।
Pages : 163-164 | 187 Views | 34 Downloads