International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

हिंदी साहित्य में व्यंग्य


रेखा श्रीवास्तव

किसी भी विषय पर उपहास करते हुए उसकी आलोचना करना और पाठक को उस समस्या के प्रति विचलित करना ही व्यंग्य कहलाता है। रामविलास शर्मा व्यंग्य को गद्य की कसौटी कहते हैं। वास्तविकता में गद्य की सजीवता और शक्ति उसके व्यंग्य लेखन में ही होती है। यह किसी सामान्य मस्तिष्क की उपज नहीं हो सकता इसके लिए एक आलोचक और दूरदर्शी मस्तिष्क आवश्यक है। साहित्यकार समाज की विसंगतियों को अपने अलग ही दृष्टिकोण से देखता और परखता है। समाज की कुरीतियों, विसंगतियों, भष्ट्राचार, शोषण, राजनीति आदि पर व्यंग्यकार कुछ इस प्रकार से तंज कसता है कि पाठक उस समस्या की गंभीरता को आत्मसात कर उसके विषय में सोचने को विवश हो जाता है। हिंदी साहित्य में व्यंग्य लेखन की परंपरा के प्रमाण हमें कबीरदास जी के साहित्य में भी मिल जाते है- जब उन्होने धर्म के बाह्य आड़म्बरो पर तीखा व्यंग्य करते हुए उसकी आलोचना की। परन्तु हास्य व्यंग्य की नियमित परंपरा आधुनिक हिंदी साहित्य में तब से दृष्टिगोचर होती है, जब हिंदी में भारतेंदु जी का प्रादुर्भाव हुआ। भारतेंदु के पूर्व का व्यंग्य पद्यबद्ध है परन्तु आधुनिक हिंदी का व्यंग्य पद्य के साथ ही गद्याश्रित भी होता गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हास्य व्यंग्य की एक ऐसी सशक्त परंपरा चली जिसने समाज की विसंगतियो को अपने लेखन से समाज के समकक्ष अत्यंत प्रभावी ढ़ंग से प्रस्तुत किया।
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