International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

अहिंसा की उत्पत्ति और पर्याय


गौरव कुमार

अहिंसा जितनी कठिन मानी जाती है उतनी कठिन है नहीं!। जरूरत यह है कि हम अहिंसा को स्पष्टता के साथ उसके सर्वोपरि उपयोगिता को समझ लें तो आचरण करना कठिन नहीं है। इसके लिए भारत-सावित्रीवाला श्लोक बार-बार दुहराना आवश्यक है उसमें ऋषि कवि पुकार-पुकार कर कहते हैं कि जिस धर्म में शुभ अर्थ और शुभ काम सहज ही समाये हैं ऐसे धर्म का आचरण हम क्यों नहीं करते। यह धर्म तिलक लगाने अथवा गंगा स्नान करने का नहीं है, बल्कि अहिंसा और सत्य का है। हमारे यहाँ दो अमर वाक्य हैः ‘‘अहिंसा परम धर्म है’’, और ‘‘सत्य के सिवाय और दूसरा धर्म नहीं है।’’ इसमें इच्छा करने के योग्य समस्त अर्थ और काम निहित हैं तो फिर हम हिचकिचाते क्यों हैं? फिर भी, स्वीकार करना पड़ता है कि जो सरल है, वही लोगों को कठिन मालूम पड़ता है। यह वृत्ति हमारी जड़ता को सूचित करती है। यहाँ जड़ता शब्द को निन्दा के अर्थ में नहीं समझना चाहिए। यहाँ मैंने पारिभाषित अंग्रेजी शब्द का अनुवाद किया है। वस्तु-मात्र में जड़ता नामक गुण रहता है और वह अपनी जगह उपयोगी भी है। इसीलिए हम टिके हुए हैं। जड़ता का यह गुण न हो, तो हम दौड़ते ही रहें। लेकिन इस जड़ता के वशीभूत हो जाने से हम लोगों में इस मान्यता ने घर कर लिया है कि सत्य और अहिंसा का पालन करना बहुत कठिन है। यह जड़ता दोषयुक्त है। इसके दोष को दूर करना आवश्यक है। पहले तो हमें संकल्प करना चाहिए कि असत्य और हिंसा से चाहे जो लाभ हो, हमारे लिए यह निषिद्ध है; क्योंकि वह लाभ, लाभ नहीं बल्कि हानि-रूप होगा। यदि हम इतना निश्चयपूर्वक मान लें, तो दोनों गुण सरलता से सीखे जा सकते हैं।
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