International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

विशुद्धिमार्ग के परिप्रेक्ष में समाधि का स्वरुप और उसकी उपादेयता


शरद पंढरीनाथ सोनवने

समाधि को तथागत बुद्ध के उपदेशों में निर्वाण ;ज्ञानद्ध प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम साधन माना गया है। विशुद्धिमार्ग नामक ग्रन्थ में समाधि विषय की विस्तृत चर्चा की गयी है जो उसके महत्व को स्पष्ट करती है। समाधि चित्त की वह अवस्था है जहाँ साधक अपने चित्त को किसी एक आलम्बन पर स्थिर कर देता है और चित्त तथा शरीर की अनित्यता का यथाभूत दर्शन करता है। समाधि से साधक शरीर के दुखमय और अनात्म स्वभाव का दर्शन करता है। समाधि को आधार बनाकर साधक सभी दुखों से मुक्त हो सकता है। चित्त की परिशुद्धि के लिए तथागत बुद्ध ने समाधि का मार्ग बताया है जिसे विशुद्धिमार्ग में आचार्य बुद्धघोष ने बहुत ही कुशलतापूर्वक समझाया है। इसलिए उनके द्वारा रचित इस ग्रन्थ को विशुद्धिमार्ग नाम दिया गया। समाधि चित्त की वह कुशल अवस्था है जहाँ साधक का चित्त राग.द्वेष और मोह रहित हो जाता है। समाधि का अभ्यास करनेवाला साधक निरंतर अभ्यास से राग.द्वेष और मोह की जड़े खोदकर कर्मसंस्कारों से रहित हो जाता है। तृष्णारहित हो जाता है जिसे बौद्ध दर्शन में निर्वाण कहा गया है जो सभी दुखों का नाशक और सुख.शांति प्रदान करनेवाला है। शीलए समाधि और प्रज्ञा इन तीन विषयों पर विशुद्धिमार्ग में चर्चा की गयी है। ये तीनों ही एक दुसरे पर आश्रित हैं। अर्थात शील के अभ्यास के बिना समाधि लगना बिलकुल असम्भव है और समाधि के बिना प्रज्ञा का उत्पाद नहीं हो सकता। प्रज्ञा के उत्पाद के बिना मनुष्य के दुखों का नाश करना संभव नहीं। समाधि की प्राप्ति के लिए चालीस कर्मस्थान विशुद्धिमार्ग में बताये गए हैं जिनकी चर्चा और महत्व इस शोध.पत्र में प्रस्तुत किया गया है। समाधि कायाए वाचा और चित्त के कर्मों को सुधारने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कायाए वाचा और चित्त के कर्मों में जैसे.जैसे सुधार होता है वैसे.वैसे कोई भी व्यक्ति नैतिक जीवन का अनुसरण करने लगता है यह समाधि का सबसे बड़ा लाभ है। मनुष्य के विकारों का प्रहाण करने के लिए समाधि अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि विकारों के कारण ही मनुष्य दुराचार करता है। इस शोध.पत्र में इस बात को स्पष्ट की गयी है कि समाधि मनुष्य के नैतिकए अध्यात्मिकए मानसिक तथा सुख.शांति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।
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