International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

राजेंद्र यादव के कथा साहित्य में नारी दर्शन


अंजना सिंह

राजेंद्र यादव के कथा साहित्य में नारी के प्रति दृष्टि, नारी के दृष्टिकोण व उसकी मनोवैज्ञानिक दशा का वर्णन है, राजेंद्र यादव संघर्षों से जूझने वाले लेखक हैं, संघर्षों से पलायन उनकी प्रवृत्ति नहीं है, विरोधी परिस्थियों का डट कर सामना करने में वे विश्वास करते हैं यही संघर्ष उनकी रचनाओं में नारी के हर रूपों में देखने को मिलता है I प्रत्येक रचनाकार के लेखन की कुछ सीमाएं होती हैं जो उसकी विचारधारा, अभिरूचि और सौंदर्यबोध एवं संवेदनशीलता का पर्याय होती हैं I राजेंद्र यादव के कथा साहित्य में अभिव्यक्ति एवं प्रगतिशीलता दोनों ही देखी जा सकती है I राजेंद्र यादव के कथा साहित्य में स्त्री पात्र वस्तुतः पुरुष पात्रों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील और विद्रोही हैं, जो परिवेशगत सीमाओं का अतिक्रमण करना चाहती हैं I राजेंद्र यादव के उपन्यास तथा कहानियां इस बात का साक्ष्य हैं की व्यक्ति और समाज के किसी भी तरह पुरानी तथा रूढ़ियों के आधार पर किसी भी तरह का बदलाव उन्हें स्वीकार नहीं है, वह सामाजिक जीवन- सन्दर्भों में सामाजिक जीवन की विसंगतियों और विडम्बनाओं से भी रूबरू होते हैं, व्यक्ति मन की कुंठाओं- विसंगतियों और आकांछाओं से भी उनके चरित्रों की अपनी एक दुनिया है I व्यक्ति के जीवन की विसंगतियों के स्त्रोत वे, सामाजिक जीवन - सन्दर्भों में खोजते हैं, इस नाते उनका "व्यक्ति विशेष" किसी ना किसी वृहद् स्तर पर सामाजिक सन्दर्भों से जुड़ा रहता है I
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