International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

उर्मिला शुक्ल की कहानियों में स्त्री विमर्श


शिल्पी कुमारी, डाॅ. रेशमा अंसारी

स्त्री विमर्श रूढ़ हो चुकी मान्यताओं व परम्पराओं के प्रति असंतोष व उससे मुक्ति का स्वर है। पितृसन्तात्मक समाज के दोहरे नैतिक मापदंडो, मूल्यों व अंतर्विरोधों क¨ समझने व पहचानने की गहरी अंतर्दृष्टि है। स्त्री सशक्तिकरण के इस दौर में भारतीय नारी विषयक दृष्टि की प्रासंगिकता अब पूरे विश्व में सिद्ध हो रही है। नारी अब अबला, पराश्रिता, सुकोमला नहीं रही। बडे़-बडे़ संघर्षों, चुनौतियो और संकटो में उसकी रचनात्मकता तथा शक्ति-रूप छवि अब विशेष रूप से उजागर होने लगी है। छत्तीसगढ़ की महिला लेखिकाओं लेखिकाओं में राज्य की प्रसिद्ध महिला साहित्यकार और प्रथम डी.लिट उपाधि प्राप्त डाॅ. उर्मिला शुक्ल ने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री विमर्श क¨ समृद्ध किया है। 'गोदना के फूल’ से लेकर 'इक्कीसवीं सदी में नारी’ तक की उनकी रचनाओं में स्त्री विमर्श देखने को मिलता है।
Pages : 116-117 | 288 Views | 133 Downloads