International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

अनामिका के ‘अवांतरकथा’ उपन्यास में नारी चेतना


कंचन टी. जी

चेतना मनुष्य का प्रमुख गुण है चेतना यानि व्यावहारिक ज्ञान यह ज्ञान परिवर्तनशील और प्रवाहमान होता है। यह चेतना हमारे जीवन में सहगामी होती है क्योंकि यह हमारे जीवन अनुभव से जुडी रहती हैं इसलिए इसे हम व्यक्तिगत अनुभव कहते हैं। इस प्रकृति की एक अद्भुत मानव जाति है नारी जो हमेशा अपने अधिकारों के प्रति जागृत और सचेत रहती है, इसी भाव को नारी चेतना कहा जाता है। नारी इस सृष्टि की एक अद्भुत सृष्टि है जो चेतनशील, सेवामय, ममतामयी, सहनशील, कर्त्तव्यपरायण, स्वाभिमान और विवेकशील होती है। वह अपने परिवार ही नहीं अपितु अपने आस-पास के लोगों के दुख को दूर करनेवाली सहायिका भी होती है। इन भावों और विचारों से ओत-प्रोत नारियों का चित्रण ‘अनामिका’ ने अपना उपन्यास ‘अवांतरकथा’ के माध्यम से समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया है।
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