International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

गोस्वामी तुलसी के काव्यों में समाजिक परिदृश्य


संगीता कुमारी झा

तुलसीदास अपने युग के दुर्धर्ष योद्धा थे जो अकेले अनेक मोर्चों पर लड़ रहे थे क्योंकि समग्र भारतीय जीवन और संस्कृति को अपनी कल्पना द्वारा वे साकार देखना चाहते थे। किसी भी महान कृतिकार के सृजनात्मक साहित्य में अंकित और प्रतिबिम्बित तत्कालीन समाज के स्वरूप का साक्षात्कार दोहरे तरीके से ही करना उचित प्रतीत होता है। एक तो यह कि हम उस कृतिकार के युग और परिवेष से प्ररिचय प्राप्त करें और दुसरा यह कि उसके कृतित्व में प्राप्त तत्कालीन साजिस यथार्थ को ऐतिहासिक संज्ञान के आलोक में परखें। तुलसी की सामाजिक संरचना में सामंती राजतंत्र की विचार-दृष्टि का प्रतिफलन सर्वत्र दिखाइग् देता है गरीब ने बाज, दीन दयालु, कृपानिधान, दलितों-वंचितों के शरणदाता के रूप में सर्वषक्तिमान प्रभु राम की कल्पना से यह स्पष्ट होता है कि गोस्वामी जी व्यवस्था तो राजतंत्र की ही सर्वश्रेष्ठ समझते थे। पर उस व्यवस्था में राजा के पद वे अपने आदर्षों के अनुकूल उदार राज को अधिष्ठित करना चाहते थे। तुलसी अपने काव्य में जाति प्रथा अथवा वर्णांश्रम व्यवस्था पर लगातार हो रहे प्रहार शुद्रों, अत्मजों और दलितों जातियों के भीषण उत्पीड़न के विरूद्ध और धर्म-परिवर्तनों नाथों, सिद्धों और संतो द्वारा वर्णाश्रम व्यवस्था के विरूद्ध जन-जागृति से भरी बानियों और पदों का व्यापक प्रभाव और अंततः जात-पाँत, छुआछूत, ऊँच-नीच के भेदभाव से भरी आश्रम व्यवस्था के अनर पैदा हो रही टूट-फूट आदि का वर्णन मिलता है। तुलसी की विचार व्यवस्था और उनकी राजनीतिक चेतना उल्लिखित प्रवृत्ति के अविवार्य अंग के रूप में विकसित दिखाई पड़ती है। जनसाधारण पर ढ़ाये जा रहे जूल्म, उनकी दुरवस्या, द्ररिद्रता तथा भूखे-नंगे लोगों की चीख-चीत्कार का वर्णन उन्होंने पूरी मार्मिकता और करूणा के साथ कि है। यहाँ तक कि महामारी, अकाल, गरीबी आदि की तत्कालीन वास्तविकता पूरी प्रखरता के साथ अंकित हुई है। धार्मिक पाखण्ड, आडम्बर, झूठ, मक्कारी, अनैतिकता आदि का पर्दाफास करने में भी गोस्वामी जी ने भरपूर कोषिष की है। पर अपने युग के सामाजिक-राजनीतिक संकट का हल प्रस्तुत करने में वे वैदिक-पौराणिक संस्कृति के ढ़ाँचे पर ही काम लिया है। उनके पास एक ही हल है-भक्ति, राम की भक्ति। तुलसी वर्तमान यथार्थ के संकट के समाधान प्रस्तुत करने में रामकथा के सभी चरित्रों और उपरिव्यानों का आदर्षीकरण करते हुए दिखे है। गोस्वामी की सम्पूर्ण कृतित्व के अन्दर इस असंगति से उत्पन्न द्वन्द और तनाव की गूँज-अनुगूँज सुनी जा सकती है।
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