International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

उपन्यास के तत्त्व और मनोविज्ञान


अंशुमाला

साहित्य और मनोविज्ञान का संबंध अतिप्राचीन है। साहित्य, और मनोविज्ञान दोनों के केन्द्रीय विषय मनुष्य है। अतः इनमें परस्पर पूरक संबंध होना स्वाभाविक है। मनोविज्ञान जो कभी भारतीय मनुष्यों के बीच दर्शन का विषय हुआ करती थी आज अपने क्षेत्र-विस्तार के कारण स्वतंत्र विषय का रूप ले चुका है। आधुनिक युग में मनोविज्ञान का स्वतंत्र रूप मनोविश्लेषणबाद के रूप में काफी लोकप्रिय हो गया है। फ्रायड, एडलर, युंग द्वारा प्रतिपादित मनोविश्लेष्णवादी सिद्धान्त का हिन्दी के उपन्यास पर भी काफी प्रभाव पड़ा और उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है। हिन्दी उपन्यास में मनोवैज्ञानिकता का प्रवेश प्रेमचंद्र के उपन्यास-साहित्य से ही हो चुका था। परन्तु उसका आधार बाह्य यथार्थ था। जैनेन्द्र के उपन्यास के साथ मनुष्य के मनोजगत का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाने लगा। अन्तःस्तल के भावजगत को उल्लेखित करने की यह धारा सतत् पुवाह्मान है।
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