International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

शैव धर्म एवं उसका विकास


डाॅ. कविता षर्मा

शैव शैव धर्म, भारतीय संस्कृति में सनातन काल से विद्यमान है। भारतीय संस्कृति के उद्गम स्त्रोत सिन्धु सभ्यता से लेकर वैदिक, उत्तरवैदिक, महाकाव्यकाल एवं विभिन्न राजवंषों में इस धर्म की एकरूपता एवं निरन्तरता विद्यमान थी। जहां तक प्रामाणिक तथ्यों पर गौर करे तो लिंग पूजा सिंधु सभ्यता से प्रारम्भ होकर आधुनिककाल में भी वैसी ही प्रासंगिक है। षिव के विभिन्न रूपों में से उनके एक विषाल एवं तपस्वी रूप जिसमें वे हिमालय की उच्च ढालू उपत्यकाओं में कैलाष पर्वत पर महायोगी षिव व्याघ्र चर्म पर ध्यानावस्थित आसनग्रहण करते है और उनके ध्यान के द्वारा इस संस्कार की स्थिति रहती है। इस रूप में वे लम्बी जटाओं का जूट धारण किये हुए है। जिसमें अर्द्धचन्द्र संलग्न होता है, चित्रित किये जाते है और जटा जूट से पावन गंगा की धारा प्रवाहित होती है। षिव का यह स्वरूप सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं मान्य है। इसके अतिरिक्त षिवलिंग की प्रसिद्धि भारतीय संस्कृति में 12 ज्योतिर्लिंगों के रूप में भारत में विभिन्न राज्यों में स्थापित है।
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