International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 6 (2020)

शब्दब्रह्म की शक्तियाँः शब्दशक्तियाँ


डॉ. आशा पाण्डेय

भाषा हमारे अंतर्निहित विचारों, भावों को अभिव्यक्त करने और उन्हें संप्रेषित करने का सशक्त माध्यम हैं। मानव इस अभिव्यक्ति और संप्रेषण के लिए शब्दों का दामन थामता है। शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और सार्थक इकाई है। शास्त्रों में शब्द को ‘ब्रह्म’ की उपाधि दी गई है। वास्तव में शब्द ब्रह्म ही हैं, क्योंकि किसी पर प्रेम बरसाना हो या किसी में इतनी कट्टर शत्रुता उत्पन्न करनी हो कि परम मित्र भी एक दूसरे की जान लेने को कमर कस लें, बस दो-तीन शब्दों की घुसपैठ पर्याप्त होती है। इसी शब्द-ब्रह्म का प्रयोग करके साहित्यकार आपदाओं-विपदाओं के बड़े-बड़े समुद्र पारकर मानवता की रक्षा का दायित्व वहन करता है।। आचार्य भामह ने शब्द का परिचय देते हुए कहा है - “अर्थ-प्रतीति के लिए जिसका उच्चारण किया जाए, उसे शब्द कहा जाता है।”1 शब्द का मूल स्वभाव है अर्थ-बोध कराना। शब्द और अर्थ का संबंध शाश्वत और नित्य है। ‘वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थ प्रतिपतये। जगतः पितरौ वंदे पार्वतीपरमेश्वरौ।।’2- शब्द और अर्थ एक दूसरे से अर्द्धनारीश्वर शिव और पार्वती की तरह जुड़े हुए रहते हैं। शब्द के बिना अर्थ और अर्थविहीन शब्द का कोई महत्त्व नहीं होता है। “गिरा अरथ जल वीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न।”3 - अर्थात् वाणी (शब्द) और अर्थ का संबंध जल और वीचि (लहर) के समान है, जो एक दूसरे से अलग नहीं है। शब्द और अर्थ के इस संबंध का अध्ययन व्याकरण के अंतर्गत किया जाता है और साहित्य में साहित्यशास्त्र (काव्यशास्त्र) के अंतर्गत। इस शोधलेख में शब्द के अर्थ को प्रकट करने वाली प्रमुख तीन शक्तियों का भेदोपभेद के साथ निरूपण किया गया है।
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