International Journal of Hindi Research

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Vol. 2, Issue 6 (2016)

मुक्ति बोध चेतस् के मुक्तिबोध: समसामयिक संदर्भ (कबीरदास, निराला एवं मुक्तिबोध)


प्रो0 राजकुमार लहरे

कबीरदास (सामाजिक बोध के नेता) पं0 सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (स्वाधीन चिंतन के अग्रदूत) और गजानन माधव मुक्तिबोध (स्व़तंत्र भारत के पथ प्रर्दशक) हिंन्दी साहित्य के इतिहास में नवचेतना, अवबोध तथा अभिव्यक्ति के प्रकाश-स्तंभ हैं। जहां से व्यक्ति, परिवार, समाज और देश दिशा निर्देशित होता रहा है। समकालीन समस्याओं- नक्सल व आतंकवाद, संकर संस्कृति का प्रभाव, राजनीतिक दलीय स्थिति तथा ज्ञानियों के द्वारा अशिक्षितों पर अंधाधुन्ध ज्ञानात्मक प्रहार, चेतना का गुटीय विकास से मुक्ति, पर्यावरणीय चेतना जैसे समस्याओं का सही व सार्थक निदान सर्व चेतना के विकास द्वारा संभव है। जहाॅं सभी प्राणि 'वसुधैव कुटुम्बकम' व 'मानव मानव एक समान' भाव का सत्यानुभूति कर विकास कर सके। इसी को 'रामराज्य', 'विश्वमंदिर' व वास्तविक लोकतंत्र कह सकते हैं। जहाॅं सबका समान रुप से भाग हो। और यही ब्रम्हानंद की स्थिति होगी।
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