International Journal of Hindi Research

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International Journal of Hindi Research
Vol. 4, Issue 4 (2018)

अहिंसक जीवन शैली की व्यावहारिकता : मानव समाज की समरसता का आधार - जीवन मूल्य के सन्दर्भ में एक सूक्ष्म विश्लेषण


मेधावी शुक्ला

प्रस्तुत शोध आलेख में मानव जीवन की उस महान परम्परा को उल्लेखित किया गया है जिसमें वह धर्म के सर्वाधिक अनुकरणीय सिद्धांत से अनुप्राणित होते हुए गतिशील रहता है । मनुष्यता की रक्षा और सामाजिक समरसता के आधार स्तम्भ के रूप में प्राचीनतम से आधुनिकतम तक मानव के समीप, मानस को अभिप्रेरित करने हेतु “ अहिंसा परमो धर्म : ” की विराट स्वीकारोक्ति ही है । आज एक मनुष्य को अहिंसक जीवन - शैली आत्मसात करते हुए वर्तमान जीवन की विभिन्न चुनौतियों के समाधान के मुख्य कारक समदृश्य सामाजिक समरसता हेतु अपनाना आवश्यक है । अहिंसक जीवन - शैली के प्रति गहरी आस्था विकसित हो जाने पर निजी जीवन की निष्ठा स्वयं के प्रति पवित्र - भाव, भासना, भावना एवं भाषा के विविध अभिव्यक्त स्वरुप से होती है जिसमें स्व कल्याण से सर्व कल्याण का मनोभाव पूर्ण मनोयोग से संप्रेषित होता है । यह शोध आलेख अहिंसक जीवन - शैली को सामाजिक समरसता के लिए एक प्रस्थान बिंदु के रूप में प्रतिपादित करता है जिसके परिदृश्य में एक मनुष्य का पूर्णतया अहिंसक हो जाना जीवन की अनिवार्यता होती है तभी वह सामाजिक समरसता के लिए आधारभूत भूमिका का निर्वहन करने में सक्षम सिद्ध हो सकता है । प्रस्तुत शोध आलेख में अहिंसक जीवन - शैली को सामाजिक समरसता के आधार स्वरुप जिन मानदंडों को सम्मिलित किया गया है उनमें मानव समाज की समरसता का स्वरुप; अंतिम सत्य की मान्यता का दबाव; सृजन की व्यापक उत्पत्ति का मूल्यांकन ; मानव कल्याण का व्यवहार पक्ष ; प्रमुख है जो अहिंसक जीवन - शैली की पुनर्स्थापना में विशिष्ट योगदान देते है जिससे सामाजिक समरसता का पवित्र - भाव मानव जीवन के व्यवहार पक्ष में क्रियान्वित होना सहज हो सके ।
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How to cite this article:
मेधावी शुक्ला. अहिंसक जीवन शैली की व्यावहारिकता : मानव समाज की समरसता का आधार - जीवन मूल्य के सन्दर्भ में एक सूक्ष्म विश्लेषण. International Journal of Hindi Research, Volume 4, Issue 4, 2018, Pages 49-50
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