International Journal of Hindi Research

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International Journal of Hindi Research
Vol. 5, Issue 3 (2019)

वर्तमान के सन्दर्भ में नदी के द्वीप उपन्यास की प्रासंगिकता


डॉ. बिउटि दास

अज्ञेय कृत नदी के द्वीप एक मनोवैज्ञानिक विचारप्रधान बौद्धिक उपन्यास है । आज के व्यस्ततापूर्ण जीवन शैली में व्यक्ति अपनी अस्तित्व की संकट को लेकर अत्यधिक चिन्तित रहते हैं । व्यक्ति की सत्ता समाज सापेक्ष है । समाज में रहकर व्यक्ति अपनी निजी अस्तित्व, पहचान बनाने के लिए सदा जागरूक रहते हैं । जीवन के इस प्रवाह में न जाने कितनी बार व्यक्ति बनता है, मिटता है और पुनः निर्माण होता है । अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए वे विषम परिस्थितिओं से लड़ता है, संघर्ष करता है । वस्तुतः नदी के द्वीप उपन्यास एक प्रतीकात्मक उपन्यास है । यहाँ प्रयुक्त नदी का सांकेतिक अर्थ समाज के संदर्भ में हुआ है और द्वीप का सांकेतिक अर्थ व्यक्ति के संदर्भ में हुआ है । साधारणतः व्यक्ति और समाज दोनों ही एक-दूसरे के अभिन्न अंग है ठीक नदी में स्थित द्वीप की तरह । एक को छोड़क्रर दूसरी की कल्पना नहीं किया जा सकता है । समाज में व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण एवं विकास होता है ।सामाजिक रीति-नीति, आचार-व्यवहार, कला-संस्कृति आदि समाज जीवन के अपरिहार्य अंग है और व्यक्ति मानवीय मूल्यबोध, गरिमापूर्ण जीवन, आचार संहिता आदि व्यक्ति जीवन के अनिवार्य उपलब्धि को समाज जीवन से ग्रहण कर मर्यादादित जीवन जीने का ढंग अपनाते है । परन्तु व्यक्ति समाज जीवन में रहकर अपनी सत्ता में बिलकुल स्वतंत्र रहना चाहते हैं । अपने आपको सम्पूर्णविलीन कर देने में अपनी सार्थकता का अनुभव नहीं करते हैं । जिस प्रकार नदी की धारा में स्थित द्वीप धारा से घिरे एवं सम्पृक्त होकर भी द्वीप कभी अपनी द्वीपवत अवस्था से बाहर नहीं आतेठीक उसी प्रकार व्यक्ति भी समाज जीवन के प्रवाह में सम्पृक्त होकर भी अपनी अस्तित्व को समाज जीवन की धारा में विलीन कर देना नहीं चाहते हैं । द्वीप नदी की धारा से कटे होकर भी कहीं न कहीं नदी की धारा के किसी विन्दु पर वह जुड़े हुए है । व्यक्ति के लिए भी समाज निरप्रेक्ष नहीं है । अपनी विचार, चिंतन, तर्क. दर्शन, अनुभूति आदि से स्वतंत्र किन्तु उनका भी मूल्य सामाजिक जीवन के परिप्रेक्ष में देखा जाता है । प्रस्तुत उपन्यास के केंद्रीय सभी पात्र उच्च शिक्षित बौद्धिक पात्र है । उसकी संवेदना साधारण लोगों की संवेदनाओं से पृथक है । प्रस्तुत उपन्यास में समाज जीवन की झाँकी चित्रित करना उपन्यासकार का मुख्य उद्देश्य निहित नहीं है बल्कि एक विशेष वर्ग के जीवन का सच्चा चित्रण मनोविश्लेषणात्मक ढंग से उपस्थापन करना उपन्यासकार का तिरोहित लक्ष्य रहा है ।क्या आज के समाज में भी रेखा, भुवन, गौरा जैसे एक विशेष वर्ग के प्रतिनिधि स्वरूप यह पात्र विद्यमान नहीं है ? अहं, यौन-क्षुधा, प्रेम, कुंठा, मानसिक अंतर्द्व्न्द से पूर्ण मध्यमवर्गीय उच्चशिक्षित वर्ग के जीवन संवेदनाओं से क्या प्रस्तुत उपन्यास आज भी साम्यता रखता है ? आज के बौद्धिक, विचारशील, संवेदनशील व्यक्ति के संवेदनाओं के कसौटी में नदी के द्वीप उपन्यास की प्रासंगिकता क्या है ? मेरे इस शोध पत्र का अभिप्राय वर्तमान के संदर्भ में नदी के द्वीप उपन्यास की प्रासंगिकता के ऊपर पैनी दृष्टि से विश्लेषण प्रस्तुत करना ।
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डॉ. बिउटि दास. वर्तमान के सन्दर्भ में नदी के द्वीप उपन्यास की प्रासंगिकता. International Journal of Hindi Research, Volume 5, Issue 3, 2019, Pages 10-13
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