International Journal of Hindi Research

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Vol. 6, Issue 2 (2020)

पद्मावत: लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम की व्यंजना


राजीव कुमार प्रसाद

मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा लिखित ' पद्मावत ' प्रेमाख्यानक परम्परा का सबसे प्रसिद्ध एवं सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्य है इसके अन्तर्गत चित्तौड़ के राजा रतनसेन और सिंघल की राजकुमारी पद्मावती के प्रेम, विवाह और विवाह के बाद के जीवन का वर्णन किया गया है। इस कथा का पूर्वार्द्ध कल्पना प्रधान है जबकि उत्तरार्द्ध में ऐतिहासिकता। पद्मावत मूल रूप से रोमांचक शैली का कथाकाव्य है, इस काव्य में प्रेम, सौन्दर्य, प्रकृति, दर्शन, अध्यात्म, मौलिकता, रहस्यात्मकता और भारतीय संस्कृति का समग्र रूप देखने को मिलता है। यह वह काव्य है जिसके अन्तर्गत भारतीयता का आदर्श पूरी तरह देखने को मिलता है। पद्मावत के विभिन्न पात्र दार्शनिक तत्वों के प्रतीक हैं। इस दृष्टि से कुछ इसे रूपक काव्य भी मानते हैं। काव्य तत्व और भाव व्यंजना की दृष्टि से पद्मावत उच्चकोटि का काव्य है। सौन्दर्य वर्णन, प्रेम - वर्णन, संयोग, वियोग वर्णन, वीरता वर्णन, त्याग वर्णन और अनेक प्रकार के वर्णन इस काव्य के अन्तर्गत देखे जा सकते हैं। भारतीय कथा काव्य की प्रायः सभी रूढ़ियों का वर्णन सफलतापूर्वक इसके अन्तर्गत किया गया है। दोहा, चौपाई में लिखा गया अवधी भाषा से सजा हुआ पद्मावत हिन्दी सूफी काव्य परम्परा का महत्तम ग्रन्थ है । प्रेमाख्यानक सूफी काव्यों का प्रमुख लक्ष्य भारतीय जन - जीवन के चित्र के साथ प्रकारांतर से सूफी मत एवं साधना का प्रचार करना भी था। अपने रचनाओं के माध्यम से वे हिन्दू समाज में अपने सिद्धान्तों और साधना - पद्धतियों पर प्रचार करने में सफल भी हुए। सूफी साधक कवि होने के साथ भक्त भी थे। अतः अपने काव्यों में प्रेम को ईश्वर प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन बताया है। जायसी इस दिशा में सबसे अधिक सफल हुए, उनका प्रेरणा स्रोत सूफी सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त निर्देशन के लिए उन्होंने सुप्रसिद्ध भारतीय लोक कथाओं का आश्रय लिया और बखूबी अपने लक्ष्य में सफल रहे। ऐसे कवियों को भक्त श्रेणी में ही परिगणित किया गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इस धारा के कवि - भक्तों का वर्णन निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के अन्तर्गत किया है ।
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राजीव कुमार प्रसाद. पद्मावत: लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम की व्यंजना. International Journal of Hindi Research, Volume 6, Issue 2, 2020, Pages 65-67
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