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VOL. 6, ISSUE 4 (2020)
भारतीय संस्कृति के संरक्षण में शिक्षा की भूमिका
Authors
अशोक कुमार
Abstract
संस्कृति और शिक्षा का घनिष्ट सम्बन्ध इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि शिक्षा का एक प्रमुख लक्ष्य बालक को उसकी सामाजिक विरासत, उसकी संस्कृति प्रदान करना है। प्रत्येक मानव समूह में हजारों सालों के विकास के परिणामस्वरूप संस्कृति के विभिन्न अंगों का विकास होता है। यह संस्कृति प्रत्येक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को सौंप दी जाती है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी संस्कृति में जन्म लेता है। इस सांस्कृति विरासत से उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने के निश्चित प्रतिमान और प्राप्त करने के मूल्य मिल जाते हैं और उसे हर समय नये सिरे से प्रयोग नहीं करने पड़ते। बालक की संस्कृति शिक्षा सबसे पहले परिवार में प्रारम्भ होती है। परिवार में माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धी बालक को संस्कृति के विभिन्न उपकरण जैसे रीति-रिवाजों, परम्पराओं, मूल्यों, विश्वासों आदि की शिक्षा देते हैं। परिवार में ही वह पहले उचित, अनुचित में अन्तर करना सीखता है। पविार में विभिन्न प्रकार के संस्कारों के द्वारा उसको सुसंस्कृत बनाया जाता है। हिन्दू समाज में बालक को सुसंस्कृत बनाने के लिए अनेक प्रकार के संस्कार दिये जाते हैं। अन्य संस्कृतियों में भी इसी प्रकार की व्यवस्था देखी जा सकती हैं। परिवार में ही व्यक्ति नैतिक मूल्यों और धार्मिक व्यवहार के प्रतिमानों को सीखता है। परिवार में उसे शिष्टाचार सिखाया जाता है। परिवार के अन्य सदस्यों की देखा-देखी वह अपने से छोटे-बड़े और बराबर के व्यक्तियों से व्यवहार करने के तरीके सीखता है। प्रत्येक देश की संस्कृति में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले महापुरुषों पर उनके बाल्यकाल में परिवार का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। परिवार में संस्कृति की शिक्षा कुछ तो अचेतन अनुकरण के द्वारा होती है और बहुत कुछ वयस्क सम्बन्धियों द्वारा दी गई प्रत्यक्ष शिक्षा के रूप में होती है।
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Pages:04-06
How to cite this article:
अशोक कुमार "भारतीय संस्कृति के संरक्षण में शिक्षा की भूमिका". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 4, 2020, Pages 04-06
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