International Journal of Hindi Research

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Vol. 7, Issue 1 (2021)

कबूतरा जनजाति का नारी संघर्षः मैत्रेयी पुष्पा की ‘अल्मा कबूतरी’ के संदर्भ में


करबी देवी

‘अल्‍मा कबूतरी’ उपन्यास बुंदेलखंड की कबूतरा जनजाति के माध्यम से समाज में ’जन्मजात अपराधी’ घोषित की गई तमाम जनजातियों का दस्तावेज प्रस्तुत करता है। सजा के तौर पर सन् १८७९ ई. के अधिनियम के तहत अंग्रेजों ने इस जनजाति को ’जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था। यह प्रथा आज तक चली आ रही है। उपन्यास स्त्री शोषण तथा स्त्री संघर्ष का कटु यथार्थ है जिसे गहरी संवेदना तथा जबर्दस्त सृजनात्मकता के साथ से बुना गया है। बस्ती की सबसे पहली माँ ने भूरी बेटे को कुल्हाड़ी-डंडा नहीं थमा कर पोथी-पाटी पकड़ाया। अपने बेटे को सभ्य बनाने के लिए भूरी कबुतरा जीवन तथा बदनामी का बोझ ढ़ोने को तैयार थी। पर ऐसा नहीं हो पाता। भूरी का बेटा रामसिंह कबूतरा बनकर ही जीने को अभिशप्त है। वह धीरे-धीरे अपनी संघर्ष की क्षमता खोकर पुलिस का दलाल बन जाता है और बेटा सिंह डाकू के नाम पर पुलिस द्वारा प्रायोजित मुठभेड़ में मारा जाता है। एक कबूतरा के ’सभ्य’ बनने की कोशिश का यह ’नग्नतम’ रूप है। सामजिक सरोकार के लिए विद्रोहिणी अल्मा हार नहीं मानती। अपने पिता के साथ रहती है, अपने साथ रहते राणा को बच्चे से मर्द बनाती है। कुँआरी माँ बनने का साहस दिखाती है, आततायियों को साहस के साथ झेलती है, पशुओं से भी बदतर जिंदगी जीने को बाध्य होती है। भूरी, कदमबाई तथा अल्मा एक समुच्च्य है, जिसमें तमाम अन्य स्त्री पात्र भी सिमट जाते हैं। इस तरह कुल एक ही स्त्री मूर्ति प्रतिष्ठित होती है ’अल्मा’। ये तीनों हीं स्त्रियाँ महाकाल से टकराने में सक्ष्म हैं। पर पग-पग पर उत्पीड़ित होती हैं, उनका एक-एक सपना टूटता जाता है फिर भी वे चुनौतियों से टकराती हुई संघर्ष करती है। अल्मा जितना संघर्ष करती है, अंतत: वह एक मुकाम हासिल कर लेती है। इस प्रकार वह किसी जनजाति विशेष की नहीं रह जाती। उसकी आशा-आकांक्षा और जिजीविषा जाति से भी आगे जाकर लिंग भेद तक को लाँघ जाती है।
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करबी देवी. कबूतरा जनजाति का नारी संघर्षः मैत्रेयी पुष्पा की ‘अल्मा कबूतरी’ के संदर्भ में. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 1, 2021, Pages 32-35
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